वे घने जंगल से होते हुए एक गुफा में पहुंचे. मशालें जल रही थी. जगह-जगह कंकाल-खोपड़ियां बिखरी पड़ी थी. सामने लगभग 15-17 फीट की विशालकाय शैतान की मूर्ति बनी हुईं थी. उस मूर्ति के चरणों में तांत्रिक जादुई जिसका आधा शरीर विष रूपी नीला व आधा सामान्य था, झटा बिखरी हुयी, लंगोट पहने ध्यान में लीन था.
स्वागत है...मण्डली में स्वागत हैं...नौजवानों-जादुई बिना आँखें खोले ही बोला. कबीर-मोहसिन दोनों एक-दूसरे को देखने लगे. जादुई ने बिना आँखें खोले ही मण्डली बनाने के पीछे की वजह बताना शुरू की.


कुछ साल पहले भाखरपुर गाँव के मुखिया अपने बड़े पुत्र की मानसिक बिमारी के चलते दूसरे पुत्र की चाह में तांत्रिक जादुई की शरण में आये थे. जादुई ने शैतानी मन्त्रों और शक्तियों से मुखिया की पत्नी की कोख भरी. बच्चा हष्टपुष्ट व स्वस्थ पैदा हुआ. जिसका नाम पिंटीया रखा. लेकिन तीन साल की उम्र में बरामदे में खेलते
वक़्त सांपनी के काटने से मौके पर ही मौत हो गयी. मुखिया सहित पूरा गाँव शोक में डूब गया लेकिन सबसे ज्यादा नुकसान जादुई को हुआ. पिंटीया की आत्मा मुखिया के घर में पुर्बज बन गयी और हर रात जादुई को डसने लगी. जिससे जादुई का शरीर धीरे-धीरे नीला पड़ने लगा और पूरा शरीर नीला पड़ते ही जादुई की मृत्यु निश्चित थी.
जादुई ने मौत को मात देने के लिए एक शैतानी ताकत ढूँढ निकाली जिसका नाम था मण्डली. मण्डली में पिंटीया समेत ऐसे नौ लागों की आत्मा इकठ्ठा करनी थी जो एक दूसरे-से जुड़े हो और वो आपस में ही एक दूसरे की मौत की वजह हो, लेकिन पहली हत्या पिंटीया के द्वारा होनी चाहिए थी. जादुई ने सबसे पहले सांपनी को मारकर औरत की आत्मा में परिवर्तित किया. उसने पुष्कर को एक काल्पनिक कहानी सुनाई. फिर जादुई ने पिंटीया को बाध्य किया कि वो पुष्कर की जान ले. सबकुछ योजना के मुताबिक़ हुआ...
...और आज पिंटीया, औरत, पुष्कर, राजीव, गोकुल, कबीर, मोहसिन मिलाकर कुल 7 लोगो की आत्मा मण्डली का हिस्सा बन चुकी थी. आखिरी बचे दो को लाने का जिम्मा कबीर व मोहसिन को सौंपा गया.
तीन दिन बाद कबीर व मोहसिन ने चौधरी टी स्टाल पर कहानी सुनाई. मण्डली के बाकी सदस्यों की मदद से चौधरी और छोटू 8 वें, 9 वें सदस्य बने. जादूई की ख़ुशी का ठिकाना नहीं था लेकिन उसके गर्दन के नीचे का शरीर नीला पड़ चूका था. वो जल्द से जल्द पिंटीया और उसके विष को खत्म करना चाहता था. शैतानी पूजा पूरे विधि विधान से की गयी लेकिन विष का अंत नहीं हुआ बल्कि उसकी गर्दन भी नीली पड़ गयी. अब सिर्फ चेहरा बचा था. वो स्वयं पर गुस्से में आगबबुला होने लगा. पूरी मण्डली को इस बात की चिंता सता रहा थी कि अगर जादुई मर गया तो उन्हें कभी मुक्ति नहीं मिलेंगी.
जादुई को यह समझने में कतई देर न लगी कि आखिर विघ्न क्यूँ उत्पन्न हुआ? वो मण्डली पर बरस पड़ा-
कौन जिंदा बचा है?...जिसने कहानी सुनी है लेकिन आज मण्डली का सदस्य नहीं है...किसने इतनी बड़ी गलती की है?
सब एक-दूसरे का चेहरा ताकने लगे. गलती मानने से इनकार करने लगे.
याद करो...और उसकी आत्मा को मेरे सामने ले आओ...जल्दी...अगर मैं मर गया...तो तुम्हे कोई मुक्ति नहीं दिला सकेंगा...जाओ-जादुई चिल्लाया.

सब जंगल में बैठे याद करने की कोशिश कर रहे थे लेकिन कुछ याद नहीं आ रहा था. सब उदास-हताश थे. अचानक मोहसिन के दिमाग की बत्ती जली. कुछ देर बाद वे सुमित के घर के बाहर चक्कर काटने लगे. एक दिन...दो दिन...तीन दिन बीत गयें लेकिन सुमित घर से बाहर ही नहीं निकला. वे उसके घर जाने में असमर्थ थे क्यूंकि वो एक पंडित का घर था. हवन-कर्मकांड से पवित्र. वो सब दिन में बारी-बारी से गली के नुक्कड़ पर उसके आने का इंतज़ार करते तो रात को सामने गुप्ताजी के घर की छत पर बैठ गुफ्तगू करते रहते.

अपने कमरे के भीतर सुमित की हालत ख़राब थी. उसके जेहन में डर बैठ गया था. उसे वो हर चीज़ डरा रही थी जिससे वो डर रहा था. टॉयलेट में पेशाब करते वक्त महसूस करता कि कोई उसके पीछे खड़ा है, उसके हाथ पाँव फूलने लगते. चिल्लाता हुआ पीछे देखता लेकिन ना तो मुंह से आवाज निकलती, ना कोई पीछे खड़ा होता. नहाते वक्त मुंह के साबुन लगाता तो महसूस करता कोई उसका मुंह दबोचने वाला है. कमरे में तेज गति से चलने वाला पंखा हो या हवा में लहराता पर्दा. धीरे-धीरे डर इतना हावी हो गया कि ईश्वर की मूरत भी उसे डराने लगी. पूरे दिन कमरे के एक कोने में बैठा रहता या रजाई ओढ़े लेटा रहता. पंडितजी शहर में नहीं थे वरना वे सुमित के हालचाल जानने आया करते और समस्या का निदान करते.
रात को मण्डली गुप्ताजी की छत पर बैठे-बैठे झगड़ पड़े. राजीव को दोष देने लगे-नासमझ लडकों को कहानी सुनाने की क्या जरुरत थी?...गोपालकृष्ण को सुना देते. कबीर ने सफाई दी-हम भला उस लड़के को क्यूँ रोकते?...हमारा काम दो से हो रहा था. पुष्कर औरत पर भड़क गया-उसे कहानी सुनाने की क्या जरुरत थी?, किसी और को सुना देती. गोकुल बीच में कूद पड़ा-यह बात मैं तुझसे भी पूछ सकता हूँ.
बहस करते-करते आधी रात बीत गयी. बहस के पीछे कभी न मुक्ति मिलने का डर छिपा था. उसी वक्त सुमित अपने डर को मात देकर घर से बाहर निकला. मण्डली में ख़ुशी का ठिकाना नहीं रहा. इस ख़ुशी में फिर से झगड़ना शुरू कर दिया, सुमित को कहानी सुनाने कौन जायेंगा? फिर से कहानी सुनाने का निर्णय इसलिए लिया गया कि पिछली दफा उसने आधी कहानी ही सुनी थी. फैसला औरत के हिस्से आया.
सुमित एक पार्क में जाकर बेंच पर बैठा. कुछ वक्त बाद एक औरत के रोने की आवाज सुनी. पलटकर देखा तो वो दूर एक बेंच पर बैठी रो रही थी. सुमित ने मुंह फेर लिया. जब काफी देर तक उसका रोना बंद नहीं हुआ, तो वो उठकर उसके पास गया.
क्या हुआ?
अजीब-सा...बहुत ज्यादा...मुझे कुछ भी याद नहीं...मैं ऐसी जगह कैसे पहुंची?
कैसी जगह?
न जाने मैं कहाँ चली जा रहा थी? मौसम भले ही सुहावना था पर जिस रास्ते पर मैं चल रही थी वो कुछ रेगिस्तान सा प्रतीत हो रहा था. आस पास कंटीली झाड़ियाँ, चमकती रेत जिस पर बिना पैर धंसे आसानी से चला जा रहा था. दूर दूर कुछ पेड़ नजर आ रहे थे. हर पेड़ के बीच लगभग 200 मीटर का फासला था.  मैं धीरे-धीरे आगे बढते हुए दायें बाएं देख रही थी. इंसान तो दूर, पंछियों के उड़ने की भी आहट नही थी. धीरे-धीरे रास्ता चढ़ाव का रूप लेने लगा. ना जाने क्यूँ मुझे बस आगे बढ़ना था.  मैं यह सोच भी नही रही थी कि आखिर कहाँ जा रही हूँ?            थोडा और चलने के बाद मैं रुक गयी. मेरे सामने दो रास्ते थे. दायीं तरफ संकरा, बायीं तरफ चौड़ा. दोनों ही रास्तो के किनारे पर कंटीली झाड़ियाँ का घेराव था. मैंने बिना वक़्त बर्बाद किए संकरे रास्ते को चुना जिसका चढ़ाव पहले के मुकाबले थोडा ज्यादा था. मैं बेझिझक चढाव पर चढ़ी जा रही थी. जहाँ चढ़ाव खत्म हुआ उसके आगे दायीं तरफ रास्ता मुड़ा. सामने उबड़-खाबड़ सा मैदान था. कहीं छोटे, कहीं बड़े खड्डे थे. कंटीली झाड़ियाँ से मैदान भरा हुआ था. दूर-दूर तक कोई नजर नहीं आ रहा था. थोडा और चलने के बाद एक चट्टान पर चढ़कर नजर घुमाई तो नजारा बदल चुका था. बिना कंटीली झाड़ियों के छोटे-मोटे तालाब थे. उन तालाबों के आगे बहुत पुराना किला नजर आने लगा.
तभी कुछ भोंकने जैसी आवाज सुनाई दी. मैंने पीछे देखा. जहाँ चढाव खत्म हुआ था वहाँ पर एक सफ़ेद कुतिया और उसके तीन पिल्ले खड़े मुझे घुर रहे थे. उनका मुंह खून से सना था और शरीर पर काफी बाल थे. साथ ही उनके मुंह से लार टपक रही थी. उनकी भड़काऊ शक्ल देख मेरा दिल की धडकने तेज़ होने लगी. वो सब मेरे पर हमला करने की फिराक में थे. मैं धीरे-धीरे चट्टान से नीचे उतरने लगी. मेरी नजरें जमीन पर पत्थर ढूंढने लगी. मुझे कुछ मिला. अविश्वसनीय, पत्थरों के बने शेर, ऐसी कारीगरी मैंने पहले कभी नहीं देखी थी.  लेकिन गौर करने वाली बात यह थी कि जब मैं यहाँ आयी तब ऐसे पत्थर नहीं दिखे थे. मेरे पास ज्यादा सोचने का वक्त नहीं था.  मेरा चेहरा पसीने में तर होने लगा था. एक पत्थर का शेर उठाया और पूरी ताकत से उन पर दे मारा. वो पत्थर जैसे ही एक पिल्ले को लगा, उसके शरीर पर घाव हो गया और उस घाव से खून टपकने के साथ वो तडपने लगा. मुझे समझ में नही आ रहा इस हल्के पत्थर के शेर से इतना गहरा घाव कैसे हो सकता? कुछ ही सेकंड्स में उस पिल्ले ने दम तोड़ दिया. पिल्ले के मरने से उसके साथ बाकी सदस्यों की आँखों में गुस्सा बढ़ने लगा. लार गहरी होती जा रही थी. उनकी माँ कुतिया धीरे-धीरे मेरी तरफ बढ़ने लगी.
             मैंने तपाक से दो पत्थर उठाकर उनकी तरफ फेंके. दो पिल्लो का वैसा ही हश्र हुआ जैसा पहले का हुआ. उन्होंने ने भी एक वार में ही दम तोड़ दिया. वो कुतिया धीरे-धीरे मेरे और करीब आ रही थी. लेकिन अंततः मैं जीत गयी. मैं हांफ रही थी. तभी मुझे ऐसा लगा कि कोई मेरे पीछे खड़ा है. मैंने पीछे मुड़कर देखा. एक काला सा लड़का खड़ा था. वो बहुत ज्यादा काला था. उसने काले रंग के जीन्स-टीशर्ट पहन रखे थे. उसके चेहरे पर वैसा ही घाव जैसा पत्थर मारने के बाद उस कुतिया और पिल्लो के शरीर पर हुआ था.
यहाँ कोई रहता नही क्या?-मैंने उस काले से लड़के से पूछा.
मैं रहता हूँ ना यहाँ
इतना कहते ही उसने मेरी गर्दन पकड ली. उसकी पकड़ काफी मजबूत थी. लेकिन अपनी गर्दन उसके पंजे छुड़ाने में कामयाब हुयी. उसे धक्का देकर भागना शुरू किया. मेरी धडकने रुक-रुक कर धड़क रही थी. गला पूरी तरह सूख गया था. वो मेरे पीछे भाग रहा था. मैं जिस रास्ते से आयी थी, वो रास्ता पूरी तरह से बदल गया था. अब रास्ते के दोनों तरफ बड़ी-बड़ी दीवारे बन चुकी थी. रेतीला रास्ता ठोस बन चुका था और दो हिस्सो में बंट गया था. मैं जिस दायें हिस्से पर दौड़ रही थी, वो बाएं वाले हिस्से से थोडा उंचा था. अचानक मेरे पैरो में ब्रेक लग गये. रास्ते के बाएं हिस्से में हुबहू वैसी ही एक कुतिया खड़ी थी. मानो मेरा ही इंतज़ार कर रही हो. मैंने उस पर ध्यान न देते हुए फिर से भागना शुरू किया. वो कुतिया भी भी मेरा पीछा करने लगी. वो भोंकते हुए मेरी करीब आ रही थी और मेरे पास भागने के अलावा और कोई चारा नही था. तभी मुझे दायीं तरफ दीवार में दरवाजा दिखा. कुतिया मेरे पैर को काटने ही वाली थी कि मैंने कूदकर दरवाजे को खोलने के लिए पंजा मारा.

औरत ने अपनी कहानी बीच में रोककर जोर-जोर से रोने लगी.
फिर क्या हुआ?-सुमित ने पूछा.
औरत ने अपने आंसू पौंछ सुमित की तरफ देखा और गरजते हुए बोली-
और क्या?...मैं मर गयी-औरत की आवाज भारी हो गयी थी.
सुमित ने कोई जवाब नहीं दिया और वापस अपने बेंच पर लौट आया. औरत और पेड़ पर बैठी बाकी मण्डली एक-दूसरे को आश्चर्यचकित निगाहों से देखने लगी. उनकी इच्छा के विपरीत सुमित रती-भर भी नहीं डरा था. औरत उठकर सुमित के पास गयी.
तुम्हे डर नहीं लगा?
नहीं
क्यूँ?
क्यूंकि मैंने डर से मुक्ति पा ली है
सुमित के बस इतना कहने की देर थी और सुमित समेत पूरी मण्डली आसमान में उड़ने लगी. सबकी आँखें धीरे-धीरे बंद हो रही थी. और कुछ सेकंडो में सब फिजाओं में छूमंतर हो गए. उन्हें मुक्ति मिल गयी.
सुबह की 6 बज रही थी. पंडित के घर के बाहर पुलिस और एम्बुलेंस खड़ी थी. लोगो का जमावड़ा था. सुमित का शव पंखे से उतारा जा रहा था. उसने डर से मुक्ति पाने के लिए खुद को इस जहान से मुक्त कर दिया था.
जादुई ने नीले रंग से मुक्त होने के लालच में मण्डली को एक राज की बात कभी नहीं बताई थी. अगर मण्डली के एक सदस्य ने दूसरे सदस्य को कहानी सुना दी मण्डली को मुक्ति प्राप्त हो जायेंगी. सुमित ने आधी कहानी ही सुनी थी लेकिन उसकी मौत की वजह उस कहानी से पनपा डर ही था. उसकी आत्महत्या ने उसे मण्डली का सदस्य बना दिया था.

चेतावनी :- अगर कोई अजनबी आपको भुत-प्रेत-आत्मा की कहानी सुनाये तो मत सुनियेंगा...क्या पता मण्डली में भर्ती चल रही हो?

समाप्त!

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