साकरियावास

अगली सुबह सरकारी विद्यालय में टेंट-प्रांगण खोले जा रहे था. दो युवा लड़के कबीर और मोहसिन रिक्शे से उतरे है. टेंट खुलते देख दोनों एक-दूसरे को आश्चर्यचकित निगाहों से देखते है.
भाई-साहब टेंट क्यूँ खुल रहे हैं?-कबीर ने एक मजदूर को रोककर पूछा.
कार्यक्रम नहीं होने वाला हैं इसलिए
कौनसा कार्यक्रम?...राजीव जी के N.G.O. वाला
हाँ
क्यूँ?
मैं तो मजदूर हूँ...मुझे क्या पता?
ठीक हैं...राजीव सर कहाँ मिलेंगे?
मैं तो मजदूर हूँ...मुझे क्या पता?-और मजदूर चला गया.
तभी कबीर और मोहसिन की मुलाकात एक सज्जन से हो गयी. N.G.O. के सचिव गोपालकृष्ण बिहारी.
आपकी तारीफ़
जी...हम दोनों भाई हैं...मैं कबीर...और यह मुझसे छोटा मोहसिन
राजीव जी से क्यूँ मिलना हैं?”
हम दोनों उनके N.G.O. पर डाक्यूमेंट्री बनाने आये हैं
दरअसल बात यह हैं कि कल रात से ही उनकी तबियत बहुत ख़राब हैं...इसलिए कार्यक्रम भी कैंसिल कर दिया हैं...तुम्हारा मिलना नहीं हो पायेगा
सर, एक बार मुलाकात हो जाती तो...अच्छा होता...आगे फिर कभी डाक्यूमेंट्री बनाने के बारे में बात हो जाती
अभी बिल्कुल पॉसिबल नहीं है...10 दिन बाद रामगंज आ जाना-और गोपालकृष्ण सामने कमरे में घुस गए.
दोनों भाई उदास हो गए. वापस लौटने के लिए बाइक पर सामने बाँधने लगे. तभी गोपालकृष्ण ने आवाज दी.

राजीव जी बुला रहे हैं तुम दोनों को
दोनों ख़ुशी-ख़ुशी दौड़े. सामान्य परिचय के बाद राजीव ने गोपालकृष्ण को चाय-नाश्ता लाने भेजा और कहा आधे घंटे बाद परोसना.
सर, आपकी तबियत को क्या हुआ?
क्या करोंगे जानकार?
ऐसे ही
ऐसी ही मतलब...डाक्यूमेंट्री बनाओगे
दिलचस्प होग तो पक्का
बड़ी लम्बी कहानी है...बोर तो नहीं होंगे
सर, हमारा काम ही वास्तविक व काल्पनिक कहानियों पर चलचित्र बुनना है...आप बेझिझक सुनाइये
बहुत खूब...तो सुनो
कल जब मैं सकरियावास के लिए निकला तो एक नेकदिल रिक्शेवाले से मुलाकात हुईं. उसने डबल भाड़े से ज्यादा मुसाफिर की मदद को तवज्जो दी. लेकिन रास्ते में सारी नेकदिली धरी की धरी रह गयी. अनपढ़-गंवारो जैसी बातें शुरू कर दी. कहने लगा कि मैं भी साकरियावास का ही रहने वाला हूँ और वहां स्टेशन से गाँव के बीच 6 किमी के फासले पर भूत, प्रेत, आत्माएं दिखाई देती है. माना कि सृष्टि में ऐसे तत्व मौजूद होते होंगे पर ऐसा कहाँ लिखा हैं कि किसी आत्मा के दोनों पैर उल्टे होते है.
अच्छा...उल्टे पैर...
जी साहब-और गोकुल का चेहरा देख राजीव जोर-जोर से हँसने लगा.
क्या हुआ साहब?
कुछ नहीं...कितना भाड़ा लोगे?
रहने दीजिये साहब...नहीं चाहिए
क्यूँ?
आपको मेरी कहानी झूठी लगी...
हाहाहा-राजीव ने पर्स से पचास का नोट निकालकर गोकुल के हाथ में थमा दिया और पास ही बने पैदल पुल पर सीढियां चढ़ने लगा. गोकुल उसे काफी देर तक घूरता रहा, फिर मुस्कुराया.
रामगंज मेल तय समय पर रवाना हुयी. 3 घंटे बाद शिकारगढ़ स्टेशन पर रुकी तो रुकी ही रही. राजीव ने टीसी से  इतनी देर तक रुकने की वजह जानी तो गोकुल को गालियाँ देने लगा-सुबह-सुबह ऐसे लोग मिल जाते हैं... नेक-काम में रुकावटें आनी है. टीसी ने कहा-आगे रास्ते में एक मालगाड़ी की छ: बोगी पटरी से उतर गयी है...रास्ता खुलने में टाइम लगेगा
कितना?
आपको कहाँ जाना हैं?
साकरियावास
आधी रात से पहले मुश्किल है
मतलब 6 घंटे लेट!
अब क्या करे...बोगी भी तो छ: उतरी है
रात को 12:08 पर रामगंज मेल साकरियावास पहुंची. ठंडी हवाएं काफी तेज चल रही थी. साकरियावास के लिए अभी 6 किलोमीटर फासला तय करना था. वक्त के साथ बढती ठंड को देखते हुए मैंने पैदल चढ़ाई करना मुनासिब समझा. सोचा चलने से शरीर को गर्मी मिलती रहेंगी. भजन गुनुगुनाते हुए रास्ता नापना शुरू किया. एक तरफ ऊँचा पहाड़ तो दूसरी तरफ गहरी खाई. विशाल वृक्ष विशालकाय दानव से भी महादानव लग रहे थे. बमुश्किल से आधा घंटा का ही फासला तय हुआ था कि किसी ने पीछे से आवाज दी. पहले लगा कि मन का भ्रम है. मैंने चलना जारी रखा. दुबारा आवाज सुनाई दी. मैं रुक गया. अगली आवाज का इंतज़ार करने लगा लेकिन कोई आवाज नहीं सुनाई दी. मैंने फिर से चलना शुरू किया, फिर से किसी ने आवाज दी. आवाज एक औरत की थी. लेकिन स्टेशन पर तो कोई नहीं उतरा था और रास्ते में भी कोई घर-झोपडी नहीं दिखी, फिर इतनी रात को औरत. अचानक मेरा माथा ठनका. मुझे रिक्शावाले गोकुल की कही बात याद आयी.
पिछले 2-3 महीनो से गाँव-वालो को आत्मा दिखाई देती है-इंसान गलतियों का पुतला होता हैं लेकिन उससे ज्यादा डर का भी. मैंने चलने की रफ़्तार बढ़ा दी, तो उसे औरत के कदमों की आहट भी तेज होने लगी.
अरे भाई साहब...रुको...मुझे भी तो साथ लेकर जाओ...रुको...एक औरत ने अकेली मत छोड़ो...सहारा दे दो...रुको भाई साहब-मेरे में पीछे मुड़कर देखने की हिम्मत नहीं थी और ना ही मैं देखना चाहता था. मैंने कहीं पढ़ा था कि ऐसी घटना के वक्त नजर नहीं मिलनी चाहिए. मेरे चलने की रफ़्तार कब भागने में तब्दील हो गई, मुझे पता भी नहीं चला. वो औरत भी मेरे पीछे भागने लगी. दो-तीन बार रास्ते में गिरा भी लेकिन खुद को संभाल लिया. वो तो भगवान का शुक्र हैं कि मैं नियमित शाखा जाता हूँ, व्यायाम-कसरत-योगा करता हूँ तो मेरा स्टैमिना बहुत ज्यादा है. मैं उससे बच निकलने में कामयाब हुआ. बस थोड़ी तबियत बिगड़ गयी.
सर, यू आर रियली ब्रेव...बहुत हिम्मत से मुसीबत का सामना किया...अल्लाह का लाख-लाख शुक्र हैं...आप सही सलामत है
बच्चो...मैंने अपना पूरा जीवन समाज-सेवा में लगा दिया...बस उस सेवा के बदले मिली दुआओं का ही फल है...मैं आज जिंदा हूँ...बस एक बार स्वस्थ होने की देर है...अब और ज्यादा मेहनत-लगन से समाज को समर्पित हो जाऊँगा
आई होप
इस बार तो कार्यक्रम स्थगित हो गया...लेकिन अगली बार मैं तुम्हे जरुर आमंत्रित करुगा...अपना पता-फोन नंबर गोपालकृष्ण को लिखकर दे देना
शुक्रिया...आप आराम करे...हम चलते है
कबीर और मोहसिन, राजीव को अलविदा कहकर अपनी बाइक के पास पहुंचे.
फिर क्या इरादा हैं?-कबीर ने पूछा. जवाब में मोहसिन मुस्कुराया.
   
शिकारगढ़...

सुबह 5 बजे उठकर घुमने जाना सुमित की अच्छी आदतों में शुमार था और वापस लौटते वक्त चौधरी टी स्टाल की चाय के साथ ही अपने नये दिन की शुरुआत करता. लेकिन एक आदत और भी थी, कभी अख़बार न पढने की. उस दिन भी वो चाय पी रहा था कि तेज रफ़्तार से आती हुयी बाइक टी-स्टाल के बाहर रखे बेंच से टकराई और उस पर सवार दोनों लड़के जमीन पर गिरे. लोगो ने उन्हें संभाला. बेंच पर लेटाया. सुमीत ने बाइक को खड़ी कर स्टैंड पर लगाया. दोनों की साँसे फूली हुयी थी. वो ठीक से होश में भी नहीं थे. वहां मौजूद सब लोगो ने उन्हें घेर रखा था. चौधरी साहब दौड़े-दौड़े पानी ले आये और उन्हें पिलाया.
हटो...अपना-अपना काम करो...हवा मत रोको...निकलो सब यहाँ से-चौधरी चिल्लाया.
भीड़ तीतर-बीतर हुयी. सिर्फ सुमित और टी-स्टाल पर काम करने वाला छोटू वहीँ रुका. सुमित की चाय अभी खत्म नहीं हुयी थी. चौधरी ने उन लडको पर सवालों की झड़ी लगा दी.
क्या हुआ?
इतने डरे हुए क्यूँ हो?
बदमाश पीछे पड़े क्या?
कहाँ से आ रहे हो?
कहाँ जा रहे थे?
कुछ तो बोलो?
दोनों लड़के डरे-सहमे बारी-बारी से चौधरी-सुमित-छोटू को देखने लगे.
बोलो...चूप क्यूँ हो?
वो...हम...साकरियावास...से...आ...रहे...है-एक अटक-अटक कर बोला.
तो?

फिर क्या इरादा हैं?-कबीर ने पूछा. जवाब में मोहसिन मुस्कुराया और बोला-
इरादा नेक ही हैं भाईजान
तो फिर चले रात को...आवाज देने वाली औरत से मिलने
जरुर...हम भी तो देखे...यह आत्मा क्या बला होती है?

दोनों रात की करीब सवा 12 बजे साकरियावास से रवाना हुए. कबीर बेख़ौफ़ था लेकिन मोहसिन डरपोक. राजीव की कहानी सुन ओवर-कॉन्फिडेंस में आत्मा देखने का फैसला कर बैठा. उसके दिमाग में केमिकल रिएक्शन शुरू हो चुकी थी की अगर सच में आत्मा आ गयी तो? सफ़र के शुरू होने के 5 मिनट ही बीते थे रास्ते के बायीं तरफ एक छोटी दरगाह दिखाई दी.
भाईजान, इबादत कर लेते हैं-मोहसिन ने सबे पहले अल्लाह को याद करने बेहतर समझा.
कबीर मुस्कुराने लगते हैं. उसने बाइक रोकी. बाइक से उतरकर माथा टेका और फिर चल पड़े. कबीर बार-बार बाइक की हेडलाइट को ऑन-ऑफ ऑन-ऑफ कर रहे था, उसे इस बात का डर था की कहीं रौशनी देखकर कोई जंगली जानवर बाइक के सामने ना आ जाये.  मोहसिन के दिमाग में कही सवाल घूम रहे थे  और सब सवालों में एक शब्द मौजूद था....आत्मा. वो बाइक के पीछे बैठा दायीं-बायीं तरफ देख रहा था, गाने बज रहे थे लेकिन उसका ध्यान उन गानों से परे था. टेढ़ी मेढ़ी सड़क, सड़क के एक तरफ खायी थी तो, दूसरी तरफ बड़ा सा पहाड़, जिस पर टेढ़े-मेढ़े पेड़ ऐसे खड़े हुए थे जैसे मानो देत्य हो. घना अँधेरा, देत्य रूपी पेड़, एक अजीब सी आहट और थोड़ी-थोड़ी देर से हवा के तेज़ झोंके. उन पेड़ो को देखकर उसे हॉरर मूवी का वो दृश्य याद आ रहा था जिसमे आत्मा एक पेड़ से दुसरे पेड़ हवा में लहराती हुयी नायक-नायिका का पीछा करती हैं. वो दृश्य सोच-सोचकर मोहसिन बार-बार पीछे मुड़कर देखने लगा. जैसे-जैसे सफ़र आगे बढ़ रहा था, कहीं उट-पटांग सवाल उसे घेरे हुए थे. उसके जेहन में एक सवाल बार बार आ रहा था राजीव सर को उस औरत ने किस जगह आवाज दी थी?

वे 4 किलोमीटर नाप चुके थे.  उनकी बाइक से 15 फीट दूर मोड़ पर रोलिंग के पास एक साया दिखाई पड़ा. दोनों के तोते उड़ गए. वो धीरे धीरे उसके करीब जा रहे थे.  मोड़ पर दाहिनी तरफ बाइक मोड़ते हुए वे दोनों उसे देखने लगे. साया और उनके बाइक के बीच सर सिर्फ 2 फीट का फासला था.
लम्बाई होगी करीब 5 फीट, लाल घाघरा-चोली, जो अँधेरे में गुलाबी जैसा दिख रहा था, उसके चेहरे पे लम्बे-लम्बे बाल बिखरे हुए, बालो की वजह से उसका चेहरा दिखाई नही दिया, वो सड़क पर धीरे धीरे अपने कदम आगे बढ़ा रही थी.
कबीर को राजीव की बात याद आयी-ऐसी घटना के वक्त नजरें नहीं मिलनी चाहियें. उसने नजरें फेर सामने देखा लेकिन मोहसिन की नजरे सिर्फ उस साये पर टिकी हुयी थी.

देखा...देखा...देखा की नहीं...-कबीर चिल्लाया.
भेन्चोद...सब देख लिया...तू गाडी भगा-मोहसिन उस औरत को घूरते-घूरते ही चिल्लाया.

सुमित, कबीर-मोहसिन की कहानी को बीच में ही छोड़कर कब का जा चूका था. सुमित साकरियावास के पास छोटे से गाँव का रहने वाला था. शिकारगढ़ के सरकारी कॉलेज में पढता था और किसी पंडित के घर में किराए पर रहता था. दोपहर में कॉलेज से लौटकर लेट गया. आँख खुली तब शाम हो चुकी थी और आसमान में काले बादल छाये हुए थे. तभी किसी ने दरवाजा खटखटाया. बेमन से दरवाजा खोला. पंडितजी थे.
परसों के अख़बार में एक पार्ट-टाइम नौकरी का विज्ञापन आया हुआ है...कागजात भेज दे...नसीब में होगी तो मिल जायेगी...-पंडितजी ने अखबार थमाया.
ठीक है
तू तो पढता नहीं है...मुझे खुद ही देने आना पड़ा-सुमित मुस्कुराया और पंडितजी के जाने के बाद इस सुहावने मौसम में मजा लेने के लिए गैस पर चाय चढ़ाई. खिड़की में बैठकर चाय का प्याला होंठो से लगाया ही था कि
प्याला एक हाथ से छूटकर फर्श पर गिरा और दूसरे हाथ की गिरफ्त से अखबार आजाद होकर हवा में उड़ने लगा. आसमान में जोरो-से बिजली कडकी. बारिश शुरू हुयी और शहर की बिजली गुल हो गयी. इस पूरे घटनाक्रम के दौरान सुमित के रोंगटे खड़े हुए जो फिर कभी नहीं बैठे. अखबार के मुख्य पृष्ठ पर दो लडको की बाइक हादसे में मौत की खबर छपी थी और वे दोनों लड़के आज सुबह चौधरी टी पर मिले थे.

कबीर ने बाइक की गति बढ़ा दी थी. मोहसिन उस औरत की आँखों में देखे जा रहा था. एकदम से बाइक का संतुलत बिगड़ा. बाइक रोलिंग से जा टकराई और दोनों भाई हवा में उछलकर खाई में जा गिरे.

भाईजान...हम मर गए क्या?
हाँ...मोहसिन
जंगल में कबीर और मोहसिन की आत्मा अपनी-अपनी लाश के सामने बैठकर बाते कर रही थी.
अपना निर्देशक बनने का सपना अधूरा ही रह गया-और मोहसिन फुट-फुटकर रोने लगा. कबीर उसे सांत्वना देने लगा. दोनों उठकर जाने लगे. कुछ दूर निकले ही थे कि कुछ ऐसा देखा जो उनके विश्वास करने के लायक नहीं था. झाड़ियों के पीछे एक लाश पड़ी थी...राजीव की. तभी एक आवाज गूंजी-


मण्डली में तुम्हारा स्वागत है-सामने अँधेरे को चीरते हुए राजीव आता हुआ दिखाई दिया.
राजीव सर...आप मर चुके थे
हाँ...इस कहानी में जिसने भी किसी अजनबी को अपनी कहानी सुनाई हैं...वो उस कहानी के अंत में मर चूका था.
...मैंने आवाज देने वाली औरत को पलटकर देख लिया और मारा गया...फिर मैंने तुम्हे कहानी सुनाई
मैंने पुष्कर के उल्टे पैर देखे और मेरे दिल की धडकन रुक गयी...फिर मैंने राजीव साहब को कहानी सुनाई-दायीं ओर से आते हुए गोकुल बोला.
पिंटीया को देखकर मैं जंगल में भागा लेकिन उसने जंगल में मेरा पीछा किया...और मुझे डस लिया...फिर मैंने गोकुल को कहानी सुनाई-दायीं तरफ से आता हुआ पुष्कर बोला.
और इस मण्डली की शुरुआत मैंने की...सबसे पहले पुष्कर को कहानी सुनाकर-कबीर व मोहसिन के पीछे से औरत बोली. मोहसिन थरथराने लगा.
डरो मत...हम सब मरे हुए लोग है...हमें आपस में किसी से कोई खतरा नहीं
मुझे कुछ भी समझ में नहीं आ रहा है...मण्डली...कहानी...गोकुल...पुष्कर...पिंटीया-कबीर चिल्लाया.
तुम्हारे सारे सवालों का जवाब तांत्रिक जादुई देंगे-औरत बोली.
अब यह कौन है?
इस मण्डली के विधाता...चलो हमारे साथ...जादुई तुम्हारी ही राह देख रहे है

[कौन है तांत्रिक जादुई? क्या है मण्डली का राज? जानने के लिए पढ़ते रहिये "मण्डली" अगले रविवार सिर्फ Lines From Heart पर]

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