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मजहब(भाग-2)

मजहब(भाग-1)



रिवोल्वर को अपनी तरफ ताने देख एकाएक ही कमली के आँसू सुख गए. वो आहिस्ता-अहिस्ता अपने घुटनों के बल खड़ी हुई. वो एकटक गिरिराज की आँखों में अपने मसीहा को ढूंढ रही थी. हर दिन गिरिराज के संग चारदीवारी के भीतर रहते हुए वो यह बात भूल गई थी कि चारदीवारी के भीतर और बाहर के गिरिराज में काफी फर्क था. बाहर वो हिंदुत्व से प्रेम करता था और अंदर उससे. आगबबुला गिरिराज रिवोल्वर ताने खड़ा था और कमली प्यार से एकटक देख रही थी.

मरने वाली की आखिरी ख्वाहिश नहीं पूछोंगे

        ...ट्रिगर दबा और कमली की कहानी खत्म. दरवाजे पर उसकी बेटी रानी कंधे पर स्कूल का बैग डाले खड़ी थी. उसके चेहरे पर अपनी माँ के खून के छींटे थे. हमेशा गोली की आवाज सुनकर खिलखिलाने वाली रानी आज पहली बार डर के साये में खड़ी थी. उसने धीरे-धीरे पलकें उठाकर गिरिराज की तरफ देखा. गिरिराज के होंठो पर गम भरी मुस्कुराहट थी. रानी बैग को फर्श पर फेंकते हुए वहां से भाग गईं. गिरिराज काफी देर लाश के पास बैठा उसे निहारता रहा फिर उसने अपने एक कार्यकर्ता को फ़ोन कर बुलाया और लाश ठिकाने लगाने का कहकर वहां से चला गया.
        

मजहब(भाग-1)


...Also like my upcoming short film page the LEGEND of KABIRA

मजहब, एक ऐसा शब्द था जिसने ‘धर्मपुर’ गाँव को कभी चैन से न सोने दिया न जगने दिया, न जीने दिया न मरने. इस गाँव का हर एक बंदा अपने समुदाय का बाहुबली बनना चाहता था, जिसके परिणामस्वरूप गाँव हर रोज जलता रहा. एक दिन बाहुबली थक गए और जलना थम गया, फिर भी लोग घरो में दुबके रहे. पता नहीं कब, कौन, कैसे, कहाँ मार दिया जाए?
      पिछले दो सालों से हालत कुछ सामान्य हुए थे, बच्चे पाठशाला जा रहे थे, खुले में खेल रहे थे, बस औरतो और बच्चियों पर पाबंदी थी. लेकिन लल्ला 8 साल का होने के बावजूद भी पाठशाला नहीं जा गया था. वो अपनी बुड्ढी दादी के साथ रहता था. उसके जन्म के समय ही माँ चल बसी, फिर उसके पिता उसे और दादी को छोड़कर शहर चले गयें. पिछले 8 साल से हर महीने रूपये भिजवा दिया करते है पर एक बार भी गाँव नहीं लौटे. इस तरह लल्ला अपने पिता को नहीं पहचानता था.