“जिंदगी और शराब, नशा जीने में भी हैं और नशा पीने में भी हैं, बस एक बार कड़वा घूंट गले से उतरने की देर हैं, एक गम दे जाता हैं, दूसरा गम ले जाता हैं”-ग्लास के टेबल पर रखने की आवाज के साथ ही हल्की रंग-बिरंगी रोशनी व सिगरेट के धुएँ के घने गुब्बार के बीच वाह-वाह का शोर सुनाई देने लगा. जैसे-जैसे धुएँ का गुब्बार कम होने लगा, सबकी झूमती हुई शक्लें दिखने लगी. यह शहर का कोई बार था, जहाँ 20-22 साल के हमउम्र पांच दोस्त दारु पी रहे थे.

“वाह! नुकुल वाह, क्या बात कही हैं, साला सीधा दिल को छू गया”-शांतनु ने अपने बगल में बैठे नुकुल की पीठ थपथपाते हुए कहा.

नुकुल ने हिलते हुए बारी-बारी से सबकी तरफ देखते हुए हाथ उठाकर आदाब किया. आखिरी बचे दोस्त के सामने देखते ही उसकी नजर ठहर गई, जो सिगरेट के घने धुएँ में समाया कश पे कश लिए जा रहा था. उसके सामने टेबल पर दारु से भरे ग्लास के बजाय राख से घिरे 10-12 सिगरेट के Marlboro ब्रांड के पैकेट पड़े थे, जिसमें से आधे से ज्यादा वो खाली कर चूका था. वो आशीष था, सिगरेट के पैकेट देखकर यह अंदाज़ा लगाना आसान था कि जिस सिगरेट ने उसके भीतर अँधेरा फैलाकर, बाद में उसी अंधेरे को समेटने में मदद की, वो अब उसकी ज़िन्दगी का अभिन्न हिस्सा बन चुकी थी. वो एक chain-smoker बन चूका था.

“भाई, कैसी लगी मेरी शायरी?”-नुकुल ने आशीष से पूछते हुए एक कडवा घूंट गले से उतारा.

“वाहियाद!”-आशीष ने खत्म होने आई सिगरेट को नुकुल पर फेंकते हुए कहा.


“साला, हर रोज अपनी दारु को गाली देता हैं, आज तो फैसला होकर ही रहेगा, या तो यह रहेगा या दारु?”-कपिल ने पैग को होंठो से हठा जोर से टेबल पर पटका. आशीष ने एक और सिगरेट सुलगाई.

“गम दूर करने का एक ही तो दोस्त हैं दारु, पर यह साला दोस्त मेरे दुसरे दोस्त को वाहियाद बोलता हैं, मैं कतई बरदाश्त नहीं करूँगा”-रमण नशे में झूमते हुए कुर्सी पर से उठा, शांतनु ने उसे वापस बिठाया.

“वाहियाद नहीं तो और क्या?, सब मन का वहम हैं, कोई गम दूर नहीं होता, बस नशे में इंसान कुछ पल के लिए सबकुछ भूल जाता हैं, जब नशा उतरता हैं तो वापस वो ही गम चारो और मंडराने लगता हैं”-आशीष की आवाज सख्त थी, मानो वो अपने दोस्तों के रोज दारु पीने की आदत से परेशान हो चूका था.

“एक बार पीकर देख, फिर पता चलेंगा कि सब मोह-माया से मुक्ति देता हैं की नहीं”-नुकुल ने एक पैग आशीष की ओर करते हुए बोला.

“मैं ना पीता हूँ और ना पिलाता हूँ”-आशीष ने दुबारा पैग नुकुल की तरफ धकलते हुए 2-3 सिगरेट के पैकेट उठाकर वहां से चला गया.

                       आशीष सिगरेट को होंठो से लगाता हुआ बार से बाहर निकला. नुकुल लडखडाते हुए तेज कदमों से उसके पीछे पुकारते हुए आ रहा था.

“क्या हर रोज एक ही बात पर बहस करता रहता हैं”-नुकुल ने करीब आकर उसे रोकते हुए पूछा.

“हर रोज तुम्हारा पीना लगा रहता हैं, मुझे शांतनु, कपिल, रमण की परवाह नहीं, पर तेरी हैं क्यूंकि तू मेरा सबसे अच्छा दोस्त हैं”-आशीष, सिगरेट के कश लेते हुए आगे बढ़ता हैं.

“तो क्या करूँ मैं?”-नुकुल चिल्लाया. दोनों अब साथ-साथ चल रहे थे.

“तनिषा, जिसे मैं प्यार करता था, क्या नहीं किया उसके लिए, फिर भी वो मुझे छोडकर चली गई....”-नुकुल रोनी-सी शक्ल के साथ अपना दुखड़ा रों रहा था. आशीष, सिगरेट के कश लेने में मदमस्त उसकी बात का बिना जवाब दिए चल रहा था.

“....मेरा बाप, हर वक्त दुश्मन की तरह मेरे पर भड़कता रहता हैं, पढता नहीं हैं, नौकरी नहीं करता, आवारों की तरह घूमता रहता हैं, ये वो, उसे क्या पता कि दिल का दर्द क्या होता हैं?”-चिल्लाते हुए बोलने के चक्कर में नुकुल गिरने वाला था, पर आशीष ने उसे सहारा दिया.

“वाहियाद!”-आशीष ने नई सिगरेट सुलगाई.

“तुझे तो सब वाहियाद ही लगता हैं”-नुकुल अटकते-अटकते हुए बोला.

“हाँ, तनिषा तुझे छोड़कर गई क्यूंकि तुने दारु पीकर उससे झगड़ा किया, गालियाँ बकी और अब वो ही दारु पीकर तू उसकी जादुई का जश्न मना रहा हैं”-आशीष, सिगरेट को ज़मीन पर फेंकते हुए चिल्लाया. नुकुल, छोटे-से बच्चें के सामान सहमा हुआ सा उसकी तरफ देख रहा था.

“हर बाप यहीं चाहता हैं कि उसका बेटा अच्छे से पढ़ लिखकर नौकरी पर लग जाए, लेकिन तू साला पीकर उनके सामने गया तो उनका तेरे पर से भरोसा उठ गया, दोनों के बीच एक दरार पैदा हुईं, जिसे तू पीकर भरने की कोशिश कर रहा हैं, लेकिन असल में उस दरार की वजह भी तो पीना ही हैं”-आशीष की कड़क आवाज सुनकर नुकुल से हिला भी नहीं जा रहा था, वो बस अपनी पलकें झपका रहा था.

“किसी समस्या की वजह, उस समस्या के लिए समाधान कभी नहीं बन सकती....रिक्शा”-रिक्शा रुका. आशीष ने नुकुल को हाथ पकड़कर अंदर बैठाया. पूरे रास्तें में नुकुल, आशीष के गले में हाथ डालकर उसके कंधे पर सोता रहा, जब-जब जगता नशे की हालत में आशीष के गाल पर चुम्बन देता रहता, आशीष सिगरेट पीने में मशगुल था.

                 किसी सोसाइटी के मैन गेट के बाहर रिक्शा रुका. दोनों उतरे. नुकुल पर नशा हावी था.

“यहाँ से तुझे अकेला जाना पड़ेंगा, मुझे डांट खाने का कोई शौक नहीं हैं”-इतना कहकर आशीष वहां से चलने को मुड़ गया.

“जिस दिन तू पिलायेंगा ना, उस दिन मैं आखिरी बार पियूँगा”-यह नुकुल का आशीष के गुस्से का जवाब था. आशीष मुस्कुराते हुए पलटा.

“और मैं जिस दिन पिलाऊंगा, वो तेरी ज़िन्दगी का आखिरी दिन होंगा”-आशीष व नुकुल जोर-से हँसे और फिर अपने-अपने राहोँ की तरफ मुड़ गयें.

                 आधी रात बीत चुकी थी. सुनसान सड़कों पर आशीष सिगरेट पीते चल रहा था. वो अब फाइनल इयर का स्टूडेंट था. पिछलें तीन-चार साल में उसने अपने भीतर मौजूद अंधेरे पर काफी हद तक काबू पा लिया था. अकेलेपन-सी ज़िन्दगी में उसके दो ही अच्छे दोस्त थे-नुकुल व सिगरेट. जो लोग सिगरेट नहीं पीते उनके लिए सिगरेट का धुआं दम घोटने का काम करता हैं, लेकिन उसी धुएँ ने आशीष के भीतर अंधेरे को घोटने का काम किया. ट्रैफिक-सिग्नल पर लगे बड़े एडवरटाईजमेंट बैनर या सड़कों पर पड़े इश्तहार से उसका वास्ता मात्र मुस्कुराने तक ही सीमित रह गया था. उसकी कॉलेज-हॉस्टल की फीस कौन भरता था? या उसके अकाउंट में रूपये कहाँ से आते थे? उसने यह सब जानने की कोशिश अभी भी नहीं की थी, उसे इतना जरुर लगता था कि यह सब डम्बल्डोर(दादाजी) की करामात हैं.

                   शराब के मामले उसे लगता था कि पीने वाले लोगो के जीवन में जो समस्याएं हैं उसकी वजह पीना ही हैं, फिर भी लोग उसका सहारा लेकर समाधान ढूंढने की कोशिश करते रहते हैं. उसकी इस सोच पर नुकुल का जवाब होता कि तेरी ज़िन्दगी में अंधेरेपन की वजह भी तो सिगरेट ही थी फिर तुने उसी सिगरेट के सहारे समाधान कैसे ढूंढ लिया? और आशीष के पास कोई जवाब नहीं होता. वो सिगरेट के कश पे कश लगायें सोचता रहता कि उसकी सोच सही हैं या गलत?, पर जवाब पता लगाने में हमेशा असफल रहा, लेकिन बहुत जल्द उसे जवाब मिलने वाला था.
 

                    एक दिन नुकुल ने बड़े-से दरवाजे के सामने बाइक रोकी. आशीष पीछे बैठा था. दरवाजे पर लिखा था ‘’संत मुनि महाराज आश्रम’’. दोनों बाइक से उतरे.

“यह तू कहाँ लेकर आया हैं?”-आशीष ने हैरानी से पूछा.

“संत मुनि महाराज का आश्रम हैं, यहाँ गरीब, असहाय, नि:शक्तजनो के रहने व खाने –पीने का मुफ्त प्रबंध किया जाता हैं”

“कहीं तू घर छोड़कर तो नहीं आ गया इस आश्रम में रहने को?”-आशीष ने मुस्कुराते हुए पूछा.

“नहीं रे, बाप ने चंदा भिजवाया हैं गरीबोँ के लिए, घर में एक गरीब तो पाला नही जा रहा उनसे”-दोनों हँसे.

“कमीने तू सुधरेगा नहीं”

“चले अंदर”

“ना तू जा, मुझे भगवान, साधू, संत, आश्रम इन सबसे एलर्जी हैं”-नुकुल चला गया. आशीष ने एक सिगरेट सुलगाई. वो आश्रम के भीतर बसे माहौल पर नजरें घुमा रहा था. उसकी हमउम्र के कई नौजवान लडकें आश्रम में सेवा कर रहे थे. कोई गरीबोँ को खाना खिला रहे थे, तो कोई उनको हाथ पकड़कर एक जगह से दूसरें जगह ले जा रहे थे, कोई बिस्तर उठाकर एक जगह से दूसरी जगह ले जा रहा था, तो कोई पौधों को पानी दे रहा था.

“सिगरेट पीना बुरी आदत हैं”-आशीष हडबडाते हुए पीछे मुड़ा. लम्बी दाढ़ी-बाल, भगवा पहने संत मुनि महाराज खड़े थे.

“क्यूँ पीते हो सिगरेट?, अगर जीवन में आई किसी मुसीबत से छुटकारा पाने के लिए नशा का सहारा ले रहे हो, तो मेरे आश्रम में तुम्हारा स्वागत हैं, मैंने तुम जैसे सैकड़ो युवाओं को नशे से छुटकारा दिलाकर सेवा करना सिखाया हैं’

“नहीं....कुछ नहीं”-आशीष ने हडबडाते हुए सिगरेट जमीन पर फेंकी और दूर जाकर खड़ा हो गया. महाराज मुस्कुराते हुए अंदर चले गयें. आशीष ने नई सिगरेट सुलगाई. कुछ देर बाद नुकुल बाहर आ गया. दोनों बाइक पर वहां से रवाना हो गयें.

                        दोनों तनिषा के मोहल्ले से होकर गुजर रहे थे. मोहल्ले के नुक्कड़ पर बैठे तीन-चार लडकों में से आदित्य ने नुकल पर टिप्पणी की.

“वो देख शरीफ बाप की बिगडैल औलाद जा रही हैं, बाप ने भी जवानी में बहुत आशिकी की दिखती हैं तभी तो बेटा आशिक बना फिरता हैं”-इतना सुनते ही नुकुल ने बाइक रोकी. दोनों उतरे. उनकी तरफ बढे. आपस में झड़प हुईं. नुकुल के एक पंच ने आदित्य के दो दांत तोड़ दिए, काफी खून बहने लगा. दोनों वहां से भाग गए. नुकुल, आशीष को हॉस्टल छोड़कर घर चला गया.

                           आशीष अपने कमरे में सो रहा था. तभी दरवाजा खटखटाने की आवाज आने लगी. उसने उठकर दरवाजा खोला. वह नुकुल था. काफी परेशान व बैचैन दिखाई दे रहा था.

“क्या हुआ तुझे?”-आशीष चिंतित स्वर में बोला.

“आज तुझे अपनी दोस्ती कसम हैं, आज मना मत करना, आज तो दारु पीला ही दे”-नुकुल दबी आवाज में बोला.

“हुआ क्या?, बताएगा पहले?”

“सिर फट रहा हैं मेरा....रूपये नहीं हैं मेरे पास....तेरे हाथ जोड़ता हूँ....मना मत करना”-नुकुल अपना सिर पकड़कर रोने लगा.

“तू पागल हो गया हैं, हुआ क्या हैं आखिर?”-आशीष ने उसके कन्धो को हिलाते हुए पूछा.

“आज की लड़ाई में किसकी गलती थी यार?”

“आदित्य की, उसने मारा तुझे?”

“वो अपने बाप गुप्ता अंकल के साथ घर आया था, फिर मेरे बाप ने मुझे उनके सामने चांटे लगायें, आदित्य के बाप को उस पर विश्वास हैं, मेरे बाप को उन पर विश्वास हैं, लेकिन अपने बेटे पर नहीं, क्यूँ यार?”-नुकुल रोते हुए चिल्लाया.

“मेरा बाप मुझे कहता हैं कि पहले तो सिर्फ पिया करता था, आजकल पीकर लोगो के दांत तोड़ने लगा हैं, तू ही बता यार, मैंने पी राखी थी क्या?, पर अब पीनी हैं, प्लीज पीला दे यार, बड़ा एहसान रहेंगा”

“नहीं, तू चुप हो जा, सब ठीक हो जायेंगा”-आशीष ने नुकुल के बालों में हाथ फेरते हुए बोला.

“कुछ ठीक नहीं होने वाला यार, तनिषा के वापस लौट के आने की भी सारी उम्मीदें भी खत्म हो गई, उसकी सगाई तय हो गई”-और आशीष से लिपटकर सिसकियाँ भर-भरकर रोने लगा.

                      आशीष ने उसे पिलाने से साफ़ मना कर दिया, पर नुकुल हाथ जोडकर, घुटनों के बल बैठकर गुजारिश करता रहा. आखिर आशीष को उसकी जिद के आगे झुकना पड़ा. वो उसे बार ले गया. वो पहली बार किसी को दारु पिलाने के लिए राज़ी हुआ था. नुकुल पीने में मदमस्त था, तो आशीष सिगरेट में. जिस शराब के खिलाफ वो हमेशा खड़ा रहता था, आज एक दोस्त के खातिर उसका साथ देना पड़ा. नुकुल पीता जा रहा था और आशीष पिलाता जा रहा था. पीते-पीते नुकुल नशे में जाने कितनी बार रोया होंगा, हर लफ्ज में पिता व प्यार को कोसता रहा, गालियाँ देता रहा. आशीष के पास जबरदस्ती सुनने के सिवाय और कोई चारा नहीं था, साथ ही वो नुकुल को कहता जा रहा था कि “दिल में जितनी भड़ास, दर्द, गम सब आज निकाल दें, क्यूंकि आज तेरा जिगरी यार तुझे पिला रहा हैं, आखिर मैं भी देखना चाहता हूँ कि पीने के बाद कितना दर्द कम होता हैं?”.

                       तक़रीबन दो घंटे के बाद अचानक नुकुल कुर्सी से उठा. आशीष चौंका. नुकुल के पैर एक जगह नहीं टिक रहे थे, वो लड़खड़ा रहा था, आँखें झपकती जा रही थी, चेहरे पर ऐसे भाव मानो अंदर का जमीर जाग गया हो.

“चल अब, मुझे घर छोड़ आया”

“दिमाग खराब हो गया तेरा, इस हालत में तू घर जायेंगा, मेरे रूम पर सो जा, कल सुबह चले जाना , मैं आंटी को फ़ोन कर दूंगा”

“नहीं, सोऊंगा तो अपने घर पर ही”

“पागलपंती मत कर, तेरा बाप पहले से ही भड़का हुआ और अब तुझे इस हालत में देखकर जान से मार डालेंगा”

“तभी तो जाना चाहता हूँ, तू चल रहा हैं साथ या मैं अकेला जाऊं”

“ठीक हैं, चल”-आशीष, उससे बहस करने के बिलकुल भी मूड में नहीं था. आशीष ने नुकुल को नशे की हालत में उसे घर पहुँचाया, फिर अपने रूम पर आकर सो गया.

                      आशीष का मोबाइल बजने लगा. वो गहरी नींद में था. घडी में सुबह की पांच बज रही थी. आशीष का मोबाइल दुबारा बजा, मोबाइल डिस्प्ले पर शांतनु का नाम था. इस बार भी आशीष नहीं जगा. तीसरी बार बजने पर आशीष जगा. बिना आँखें खोले ही उसने मोबाइल को कान पर लगाया. चंद सेकंड्स के बाद मोबाइल हाथ से छुट फर्श पर जा गिर पड़ा. उसकी आँखें तेजी से खुली, मानो वो सो ही नहीं रहा था. कुछ पलों तक ऐसे ही लेटे-लेटे छत पर लगे पंखे को घूरने लगा. फिर अनायास उठकर भागा. दरवाजा खोलकर पडौस के कमरे का दरवाजा खटखटाने लगा.

“दीपक, दीपक दरवाजा खोल”-उसकी आवाज ऐसी लग रही थी मानो वो जबरदस्ती बोल रहा था. काफी देर तक खटखटाने के बाद दीपक ने दरवाजा खोला.

बाइक की चाबी दे....जल्दी दे”

                                         तेजी से किक मारकर बाइक पर रवाना हुआ. वो नेकर-बनियान पहने बिना चप्पल के ही बाइक पे सवार था. तेज रफ़्तार के साथ वो बाइक को भगा रहा था. सुबह की ठंडी के हवा के बावजूद वो पसीने में लथपथ हो चूका था. एक खुले मैदान में लोगो की भीड़ इकठ्ठा थी. बाइक से उतरते ही उसे ज़मीन पर पटक भीड़ की तरफ भागा. भीड़ को चीरते हुए सबसे आगे आया. सामने सफ़ेद कपडा ओढ़ाए लाश पड़ी थी. आशीष घुटनों के बल ज़मीन पर गिर पड़ा. उसकी शक्ल व आँखें मानो पसीने में जम-सी गई हो. धीरे-धीरे घुटनों के बल वो लाश के करीब पहुंचा व मुंह पर से कपडा हटाया. उसकी आँखों ने जवाब दे दिया और फुट-फुटकर रोने लगा. उसका दूसरा सबसे अच्छा दोस्त उसे छोड़कर चल बसा था. नुकुल अब इस दुनिया में नहीं रहा. नुकुल के माता-पिता व बहन भी पास ही में विलाप कर रहे थे.

“आपको क्या लगता हैं इंस्पेक्टर साहब?, कैसे हुईं नुकुल की मौत?”-एक सज्जन से पूछा.

“उसकी मौत की असली वजह शाराब हैं, नशे की हालत में या छत से गिर पड़ा या फिर कूद गया”

“लेकिन कल इसको दारु पिलाई किसने?”-रमण धीरे-से फुसफुसाया.

“तुम कहना क्या चाहते हो?”

“साहब, नुकुल अक्सर पीया करता था, कल शायद कुछ ज्यादा परेशान था, पीने के रूपये नहीं थे, तो उसने बहुत-से दोस्तों को फ़ोन करके रूपये उधार मांगे, लेकिन सबने देने से मना कर दिया”

“तो फिर उसे पिलाई किसने?, जिसने भी पिलाई हैं वो ही उसका असली कातिल हैं, क्यूंकि अगर नुकुल नहीं पीता तो यह हादसा कतई संभव नहीं था”

                 आखिरी शब्द आशीष के कानो में पड़ते ही उसका रोना रुक गया. आँसू भी ऐसे सूखे मानो वो रों ही नहीं रहा था. उसके कानो में सिर्फ इंस्पेक्टर की ही आवाज गूंज रही थी....“जिसने भी पिलाई हैं वो ही उसका असली कातिल हैं, क्यूंकि अगर नुकुल नहीं पीता तो यह हादसा कतई संभव नहीं था”. वो उठा और चुपचाप चल पड़ा. उसने ज़मीन पर गिरी बाइक उठाई औए उसपे सवार हो गया. उसने इतनी धीमी बाइक इससे पहले न तो कभी चलाई ना ही नुकुल चलाया करता था. आँखों के सामने नुकुल का चेहरा घूम रहा था था और कानो में इंस्पेक्टर की आवाज.

                हॉस्टल पहुंचकर उसने खुद को कमरे में बंद कर दिया. इतनी देर से इंस्पेक्टर की आवाज गुंज रही थी, लेकिन अब उसे नुकुल की वो बात याद रही थी जब वो कहता था कि “जिस दिन तू पिलायेंगा ना, उस दिन मैं आखिरी बार पीयूँगा” और जवाब में आशीष कहता “और मैं जिस दिन पिलाऊंगा, वो तेरी ज़िन्दगी का आखिरी दिन होंगा” और फिर दोनों जोर-जोर से हँसते, हँसने की आवाज आशीष के कानो में गूंजते उस पर कहर बरपा रही थी. आशीष दोनों कानो को अपने हाथ से दबा पलंग पर मचल रहा था, तड़प रहा था. जिस अंधेरे पर उसने सिगरेट व नुकुल द्वारा काबू पाया था, वो अब नुकुल की मौत का सदमें से या इससे भी बड़ा सदमा यह कि मैं नुकुल का कातिल हूँ, सोच-सोचकर फिर उस पर हावी होने लगा था. सिगरेट का धुँआ भी अब उसके जेहन के भीतर अंधेरे पे काबू नहीं पा रहा था. आशीष अपने पुराने दिनों में दुबारा लौट गया. उसने रूम से बाहर जाना छोड़ दिया था. सिगरेट के कश पर कश लगा खुद को नुकुल की मौत का जिम्मेदार ठहराते हुए कोस रहा था. पलंग पर पड़े इंस्पेक्टर या नुकुल की बातों जब उसकी कानो में गूंजती तो वो पलंग पर लेटे-लेते मचलता, तडपता. कई रातें उसने बिना नींद के सिगरेट के साथ बिताई. अगर नींद आ भी जाती तो नुकुल के बुरे सपने उसे परेशान करते और वो नींद में बडबडाता....’’मैंने नुकुल को नहीं मारा, मुझे माफ़ कर दे, मुझसे बहुत बड़ी गलती हो गईं यार’’, फिर अचानक कांपते हुए जागते और जोर-जोर से चिल्लाते हुए रोता रहता. वो दुबारा से अनिद्रा का शिकार हो गया था.

                           बाकी दोस्तों(कपिल, रमण व शांतनु) ने भी अपने होस्टल व घर से निकलना कम कर दिया था कि कहीं पुलिस बेवजह उनसे सवाल पूछेगी. नुकुल की मौत के बाद एक महिना बीत चूका था. आशीष ने खुद को उस कमरे में बंद रखा सिर्फ सिगरेट के सहारे या कभी-कभी चाय बिस्कुट खाने पास की थडी पर चला  जाता था. ना उसने अपने किसी दोस्त की सुध ली ना किसी ने उसकी, क्यूंकि उन सबके बीच नुकुल सेतु की तरह था और वो सेतु टूट चूका था. आशीष काफी दुबला हो चूका था और काफी दाढ़ी बड़ा रखी थी. एकदम बीमार-सा दिखने लगा था.

                       एक दिन आशीष थडी पर चाय व सिगरेट पी रहा था. तभी उधर से बाइक पर गुजर रहे शांतनु व रमण की नजर आशीष पर पड़ी. वे आशीष की हालत देख हैरान रह गए. आशीष ने उन्हें देखकर भी अनदेखा कर दिया. उन्होंने आशीष के करीब जाकर बाइक रोकी.

“साले, यह क्या हालत बना रखी हैं तुने”-शांतनु ने हैरानी से पूछा.

“नहीं, कुछ नहीं”-आशीष धीरे से बोला.

“हुआ क्या तुझे?”-रमण बोला.

“बोला ना कुछ नहीं”-इस बार आशीष की आवाज पहले की तुलना में थोड़ी तेज थी.

“यार नुकुल के जाने का दुःख हमें भी लेकिन तू....”-शांतनु के इतना कहते ही आशीष के भीतर ज्वालामुखी हिल गया, आँखों से ठंडा लावा टपकने लगा.

 “अबे, आशीष संभाल यार अपने आप को, ऐसे बच्चों की तरह क्या रों रहा हैं”-रमण ने उसके कंधे पकड़कर सांत्वना दी.

“चल हमारे साथ चल”-शांतनु व रमण ने आशीष को अपने साथ बाइक पर ले गए.

                बार के सामने बाइक रुकी. यह वो ही बार था जा अक्सर ये लोग आया करते थे. अंदर तीनो बैठे. आशीष ने सिगरेट सुलगाई. रमण ने दारु का आर्डर दिया. थोड़ी देर में दारु आ गयी, दोनों ने अपने-अपने पैग बनाए.

“बोल, हुआ क्या?”-शांतनु ने आशीष के कंधे पर हाथ रख उससे पूछा.

“मैंने नुकुल को मार डाला....”

“क्या?”-शांतनु व रमण चौंके. आशीष के हाथ से सिगरेट छुट फर्श पर जा गिरी और फुट-फुट के रोने लगा.

“हाँ, मैं ही नुकुल का कातिल हूँ”

“क्या मजाक कर रहा हैं यार, तुने?”

“मैंने ही उसे दारु पिलाई थी यार”-इस बार दोनों पहले की मुकाबले ज्यादा चौंके थे क्यूंकि आशीष ने उसे पिलाई, उन्होंने कभी सपने में भी नहीं सोचा था.

“तो यार इसमें तेरी क्या गलती?”

“मैंने नहीं पिलाई होती तो नुकुल आज जिंदा होता”-उसका जोर-जोर से रोना जारी था. शांतनु उठकर नुकुल की तरफ बढ़ उसकी पीठ पे हाथ रखा.

“आशीष संभाल अपने आप को, तेरी कोई गलती नहीं थी”

“सब मेरी गलती थी, मैंने कभी नही पिलाई किसी को और पहली बार उसको पिलाई और....”-आशीष की पागलों की तरह हरकते व रोएं जा रहा था. आशीष ने एक पैग आशीष की तरफ बढाया.

“तू पी, सब ठीक हो जायेंगा”

“नहीं”

“अरे तू पी यार, दिमाग ठिकाने रहेंगा”

“नहीं....नहीं”

“सब ठीक हो जायेंगा, नुकुल को अच्छा लगेगा, एक घूंट पी ले”-शांतनु पैग को आशीष के होंठो पास ले गया. नुकुल का नाम सुनते ही उसने मुंह खोला और जिंदगी में पहली बार कडवा घूंट गले से उतरा. कड़वेपन में मुंह बिगाड़ा, लेकिन उसका रोना रुक गया. फिर उसने शांतनु के हाथ से ग्लास छीन एक ही घूंट में पूरा पैग खत्म किया. उसके पीछे की दीवार पर एक ग्लास बनी थी और उसके पास लिखा था “एक बार होंठो से लगा तो सही, अगली बार तुझे कहने की जरुरत नहीं पड़ेंगी“. इसके बाद आशीष ने पैग पर पैग खत्म किये, साथ ही सिगरेट के कश. हर एक कडवे घूंट पर उसके कलेजे को ठंडक पहुँचती और जब आँखें झपकती तो सामने नुकुल हँसता हुआ दिखाई पड़ता और कहता “यार, आशीष, तेरी कोई गलती नहीं थी यार, तुने तो मुझे हरदम पीने से रोका, तू चिंता मत कर, लेकिन साला यहाँ पीने को नहीं मिलता, फिर भी तेरा भाई इस दूसरी दुनिया में बहुत खुश हैं, पता हैं क्यूँ?, पता हैं क्यूँ?, मेरा भाई आज पी रहा हैं” और नुकुल का जोर-जोर से हँसता हुआ चेहरा दिखने लगता. नुकुल को ऐसे हँसते देख आशीष खुद को रोक नहीं सका और नशे की हालत में जोर-जोर से हंसने लगा. साथ ही उसे नशे में ऐसा लगने लगता था कि नुकुल सच में दूसरी दुनिया में खुश हैं और आशीष के भीतर खुद को कोसने वाला अँधेरा कम होता. आशीष जोर-जोर से हँस रहा था. उसे आज पहली बार पीने के बाद एहसास हो रहा था कि वो हमेशा गलत था इस शराब में कुछ तो ऐसी बात हैं की यह लोगो की ज़िन्दगी में परेशानियां खड़ी करने का बावजूद उन्हें दुनिया की परवाह किये बगैर इन परेशानियों से कोसो दूर ले जाती हैं. उसे अपने सवाल का जवाब मिल गया था कि उसकी ज़िन्दगी में सिगरेट की तरह शाराब भी लोगो की ज़िन्दगी में समस्याओं की वजह भी हैं और समाधान भी. वो जोर-जोर से हँस रहा था.

“आशीष, संभाल अपने आप को”-रमण बोला.

“मैं तो संभला हुआ ही रे....हाहाहाहाहाहा....साला नुकुल सच बोलता था....हाहाहाहाहाहा....”

“....जिंदगी और शराब, नशा जीने में भी हैं और नशा पीने में भी हैं, बस एक बार कड़वा घूंट गले से उतरने की देर हैं, एक गम दे जाता हैं, दूसरा गम ले जाता हैं....दूसरा गम ले जाता हैं”.