“जिंदगी और शराब, नशा जीने में भी हैं और नशा पीने में भी हैं, बस एक बार कड़वा घूंट गले से उतरने की देर हैं, एक गम दे जाता हैं, दूसरा गम ले जाता हैं”-ग्लास के टेबल पर रखने की आवाज के साथ ही हल्की रंग-बिरंगी रोशनी व सिगरेट के धुएँ के घने गुब्बार के बीच वाह-वाह का शोर सुनाई देने लगा. जैसे-जैसे धुएँ का गुब्बार कम होने लगा, सबकी झूमती हुई शक्लें दिखने लगी. यह शहर का कोई बार था, जहाँ 20-22 साल के हमउम्र पांच दोस्त दारु पी रहे थे.

“वाह! नुकुल वाह, क्या बात कही हैं, साला सीधा दिल को छू गया”-शांतनु ने अपने बगल में बैठे नुकुल की पीठ थपथपाते हुए कहा.

नुकुल ने हिलते हुए बारी-बारी से सबकी तरफ देखते हुए हाथ उठाकर आदाब किया. आखिरी बचे दोस्त के सामने देखते ही उसकी नजर ठहर गई, जो सिगरेट के घने धुएँ में समाया कश पे कश लिए जा रहा था. उसके सामने टेबल पर दारु से भरे ग्लास के बजाय राख से घिरे 10-12 सिगरेट के Marlboro ब्रांड के पैकेट पड़े थे, जिसमें से आधे से ज्यादा वो खाली कर चूका था. वो आशीष था, सिगरेट के पैकेट देखकर यह अंदाज़ा लगाना आसान था कि जिस सिगरेट ने उसके भीतर अँधेरा फैलाकर, बाद में उसी अंधेरे को समेटने में मदद की, वो अब उसकी ज़िन्दगी का अभिन्न हिस्सा बन चुकी थी. वो एक chain-smoker बन चूका था.

“भाई, कैसी लगी मेरी शायरी?”-नुकुल ने आशीष से पूछते हुए एक कडवा घूंट गले से उतारा.

“वाहियाद!”-आशीष ने खत्म होने आई सिगरेट को नुकुल पर फेंकते हुए कहा.