“ज़िन्दगी साली सिगरेट की तरह होती हैं.... बस एक बार सिर्फ सुलगने की देर हैं.... दो चीजों के सिवाय कुछ नहीं मिलता.... एक ज़िन्दगी का गला घोंट देने वाला धुआं.... तो दूसरा अतीत की काली स्मृतियों की राख, जो वक़्त के झोंको के साथ हवा में बिखरती दूर तो चली जाती हैं पर मिटती नहीं”-अखबार के आखिरी पन्ने पर किसी अज्ञात का छपा उपदेश पढ़ते ही वो लड़का मुस्कुराया.

              इंसान सिर्फ दो परिस्तिथियों में ही मुस्कुराता हैं.... एक, जब उसे कुछ समझ में नहीं आता.... और दूसरा, उसे स्वयं की सोच की सीमा से ज्यादा समझ में आने लगता हैं, तब वो मुस्कुराता हैं कि मैं इतने अच्छे से कैसे समझने लग गया? वो लड़का पहले वाला इंसान था, आखिर उसकी उम्र ही क्या थी?....सिर्फ 14 साल. फिर वो कैसे समझ पाता? लेकिन किसी महापुरुष ने कहा हैं कि किसी एक दिन ज़िन्दगी सब सिखा देंगी. वो दिन बहुत जल्द–ही उसकी ज़िन्दगी में दस्तक देने वाला था.


              बस स्टॉप की तरफ आती सिटी बस का हॉर्न बजते ही अंकल ने अखबार समेटा. अखबार के पीछे उस लड़के को खड़ा देख वो चौंके, लड़के ने अपराध-बोध भाव से अंकल के चेहरे पे नजर डाली और चल पड़ा अपने घर की तरफ. उसका नाम था आशीष.... आशीष खन्ना. पतला-दुबला सा, घुंघराले बाल, गोल-चकोर आँखें, हल्की-सी टेढ़ी नाक व टेढ़े-मेढ़े दांत. दोपहर करीब 3 बजे स्कूल यूनिफार्म पहने कंधे पे भारी बैग लांधे स्कूल से घर जा रहा था.

              वो बस स्टॉप से कुछ दुरी पर बने आर्मी के क्वार्टर में रहता था. उसके पिता आर्मी में मेजर थे व माँ हाउस वाइफ. जब वो 6 साल का था तब एक सड़क दुर्घटना में अनाथ हो गया. तब से वो अपने चाचा-चाची के साथ रह रहा था. चाचा बैंक में क्लर्क थे व चाची ब्यूटी-पार्लर चलाती थी. उनको अपने भतीजे से ख़ास तो क्या ज़रा-सा भी लगाव नहीं था. वो आशीष के दादाजी जो रिटायर्ड कर्नल थे, फिलहाल अमेरिका में अपने तीसरे बेटे के साथ रह रहे थे, उनके आदेश की अवहेलना नहीं कर सकते थे इसलिए आशीष को बोझ ही सही पर अपने पास रखना पड़ा.

              आशीष की ज़िन्दगी भी हैरी-पॉटर से काफी मिलती-जुलती थी. फर्क बस इतना था कि हैरी सीढियों के नीचे बने छोटे-से कमरे में रहता था, तो आशीष सीढ़ियों के पास हैरी के कमरे से थोड़े-से बड़े कमरे में रहता था. हैरी को उसके अंकल ने कभी स्कूल नहीं भेजा था, पर आशीष को यह सौगात उसके दादाजी के वजह से मिली थी जो उसकी ज़िन्दगी में डम्बल्डोर थे(हैरी पॉटर उपन्यास में हार्वर्ड जादुई स्कूल के प्रिंसिपल जिनको हैरी से खास लगाव था और वो हर वक़्त उसकी मदद व रक्षा किया करते थे). हैरी के चचेरे भाई डैडली की तरह उसका भी एक चचेरा भाई था....कौशिक. वो आशीष से तीन साल बड़ा व दो क्लास आगे दसवीं में पढता था. वो डैडली की तरह मोटा-बदसूरत नहीं था, एकदम फिट था, पर आशीष पर उसके अत्याचार डैडली की तरह ही थे. वो चुपके से अपना होम-वर्क करवाता, अपने जूते पोलिश करवाता था. चाचा-चाची भी उसे घर का कुछ न कुछ काम करवाते रहते थे, बदले में आशीष को अपमान, धिक्कार व गुस्से के सिवाय कुछ नहीं मिला. फिर भी वो खुश था, इसकी वजह यह थी कि उसने बचपन से अब तक हर रोज अपमान, धिक्कार व गुस्सा सहा था जो अब उसकी आदत में शुमार हो चुका था. फ़िल्मी गाने के बोल के हिसाब से कहे तो ‘लत लग गईं’.

              बचपन में एक दिन जब वो अपने पापा के साथ स्कूटर पर ट्रैफिक-सिग्नल पर रुका तो उसकी नजर एडवरटाइजमेंट बैनर पर पड़ी. एक बड़ी सी लड़की साडी पहने मुस्कुरा रही थी. आशीष भी उसे देख मुस्कुराया. लेकिन अगले दिन वो उसी ट्रैफिक सिग्नल पे रुका तो देखा कि लड़की की जगह कोई लड़का हाथ में मोबाइल लिए बैठा था. वो बैचैन हो गया कि लड़की कहाँ चली गई? और यह लड़का कहाँ से आया? उसने पापा से पूछा तो उन्होंने मुस्कुराते हुए उसे समझाया कि लड़की रात को चोरी हो गई, इसलिए लड़के को वहां पर बिठाया हैं. लेकिन जब कोई बैनर 3-4 दिन तक नहीं हटता तो वो अपने पापा से चोरी न होने की वजह पूछता और उनके पास मुस्कुराने के सिवाय और कोई जवाब नहीं होता.         यहीं से उसके भीतर एक कीड़ा उत्पन्न हुआ. हर रोज सड़क से गुजरते उसे एडवरटाइजमेंट बैनर देखने व पढने का चस्का लगा. वो उन्हें पढने में इतना मशगुल हो जाता कि घर देरी से पहुँचता, पहले चाची डांट लगाती, फिर चाचा. कई बार तो चाचा ने पिटाई भी की पर कीड़ा नहीं मरा.

              बैनर पढने के कीड़े के अलावा एक और कीड़ा भी था उसमें, सड़क पर कुछ ढूंढते हुए आगे बढ़ना. सडक के पास फूटपाथ पर दिन में बच्चे कंचे खेलते, तो रात में बड़े-बुड्ढ़े ताश. सप्ताह में 3-4 दिन कुछ न कुछ मिलता रहता था. कभी कंचे, कभी ताश के पत्ते, कभी इश्तार के कागज़. इस कीड़े की मुख्य वजह भी उसके पापा ही थे. वो हर रोज शाम को उसे अपने साथ अजीज मित्र की कबाड़ी की दूकान पे ले जाया करते थे. घंटो गप्पे चलते और आशीष पुराने अखबार, कॉपी, किताबे, इश्तहार के साथ खेला करता और कभी कभी अपने साथ घर भी ले आता था.


              एक दिन उसे इश्तहार का कागज़ मिला जिस पर लिखा था “शीघ्रपतन के उत्तम इलाज के लिए एक बार अवश्य पधारे”. वो उसे घर ले आया. उस रात ने चाचा ने बड़ी बेरहमी से उसकी पिटाई की. तीन दिन उसे बुखार रहा, फिर भी कीड़ा नहीं मरा. उसके पास 78 कंचे इकट्ठे हो चुके थे. वो ताश के 43 पत्ते इक्कठे कर चूका था और उसका लक्ष्य था 52 पत्तो की पूरी ताश. तरह-तरह के न जाने कितने इश्तहारो का उसके पास अच्छा-ख़ासा संग्रह था. जिस दिन उसे कुछ नहीं मिलता, उस दिन वो एक हारे हुए शिकारी की तरह मायूस घर लौटता.             

              एक दिन भी जब वो घर लौट रहा था तब भी उसकी नजरें जमीन पर ही टिकी थी. अचानक उसकी नजर एक छोटे आयताकार कागज़ के बने डिब्बे पर पड़ी. उस पर पतले-से पोलीथिन का कवर चढ़ा था, जिस पर गिरती सूर्य की तीखी किरणें आशीष की नजरों को अपनी ओर आकर्षित कर रही थी. उसने करीब जाकर उस डिब्बे को उठाया, उस पर ‘Marlboro’  नाम अंकित था. वो एक सिगरेट का डिब्बा था, जो पूरा भरा सील पैक था.

            सिगरेट का डिब्बा जान उसने उसे सड़क पर फेंक दिया. कुछ देर तक वहीँ खड़ा उसे निहारता रहा. ‘Marlboro’  ब्रांड का पैकेट देख उसे बचपन के वो दिन याद आये, जब वो अपने पापा के साथ कबाड़ी-अंकल की दूकान पे जाया करता था और कबाड़ी अंकल हर रोज ऐसा ही एक पैकेट में से सिगरेट निकालकर पिया करते थे. उसने कई बार उस पैकेट को अपने हाथ में लेकर देखने की कोशिश की, लेकिन फटाक से अंकल उसके हाथ से छीन मुस्कुराते हुए कहते कि “यह बच्चों के काम की चीज़ नहीं हैं” और हर रोज उसको करीब से निहारने की जिज्ञासा मन के एक कोने में दबी रह जाती थी. आज भीतर बसा कीड़ा आशीष को आदेश दे रहा था कि आज अपनी जिज्ञासा पूरी कर ले. आज तो वो कबाड़ी अंकल भी मौजूद नहीं थे जो उसके हाथ से छीन सके. उसके भीतर बसा कीड़ा उछल-कूद मचाना शुरू कर चूका था. आखिरकार वो उस कीड़े के आदेश की अवहेलना नहीं कर सका. दायें-बायें निगाहें फेंक उसे तपाक से उठाया, अपने नेकर की जेब में रख तेज कदमों से चल पड़ा घर की तरफ.

            लोहे की फाटक खोल प्रवेश करते ही उसने अपनी दायीं तरफ छोटे-से बगीचे में कौशिक को झूले पर झूलता पाया. आशीष को देखते ही कौशिक हर बार की तरह उट-पटांग शक्लें बना उसे चिढाने लगा. आशीष उसे पूर्ण नजरंदाज करता तेज कदमों से घर के भीतर घुसा.

            घर पर उसके व कौशिक के सिवाय कोई न था. उसने ड्राइंग रूम में सोफे पर अपना बैग फेंक तेजी से सीढियां चढ़ छत पर पहुंचा. पानी की बड़ी टंकी के सिरहाने छाया में जा बैठा. जेब से सिगरेट का डिब्बा निकाल उसे अपनी उंगुलियों के बीच फिराता काफी देर निहारता रहा. उसने स्वयं को कई सवालों के बीच घिरा पाया. उसकी नन्ही ऑंखें असमंजस में और नन्ही हो चुकी थी. मैं अब इस डिब्बे का क्या करूँगा? चाचा-चाची ने देख लिया तो? कितनी बुरी तरह मेरी पिटाई होंगी? मैंने इस डिब्बे को आखिर उठाया ही क्यूँ? मैंने जब उसे फेंका था तभी वहां से चल लेना था मुझे? काफी देर तक वो शून्य की स्तिथि में सोचता रहा. फिर सिगरेट के डिब्बे को फर्श पर रख अनायास ही उठा. सीढियां उतरा और तक़रीबन 15 मिनट बाद वापस लौटा तो उसके हाथ में एक डिजिटल कैमरा था.

            वो कैमरा उसके माता-पिता की आखिरी निशानी थी. जिस दिन चाचा-चाची की बेवजह डांट पड़ती, उस दिन वो उसमें अपने माता-पिता के फोटो देख अपने अनाथ गम को कम करने की कोशिश करता. दुबारा टंकी का सहारा लिए पैर फैला कर बैठा. कैमरे को बगल में रख सिगरेट के डिब्बे की सील खोल एक सिगरेट निकाली. काफी देर तक उसे अपनी उंगुलियों के बीच फिरा उसे निहारता रहा. ठीक वैसे ही जैसे कबाड़ी अंकल बातों में मशगुल उसे सुलगाने से पहले उंगुलियों के बीच फिराते रहते थे. फिर उस सिगरेट को अपने अंगूठे से पहली-दूसरी उंगुली के बीच फंसा होंठो से लगाया. मुंह में एक गहरी स्वांस भीतर खिंची, मानो एक सुलगती सिगरेट का कश ले रहा हो. फिर सिगरेट को होंठो से हटा आसमान की तरफ देख होंठो को एक-दुसरे से थोडा-सा अलग कर हवा बाहर फेंकी. ऐसा करते वक्त जेहन में बार-बार कबाड़ी अंकल की दूकान के स्मरण ताजा हो रहे थे, साथ ही बीड़ी-सिगरेट पीते वो लोग जिन्हें आशीष स्कूल से आते जाते वक्त बड़े घोर से देखा करता था.

           कुछ देर तक हवा के कश ले उसने कैमरा ऑन किया. उंगुली में पकड़ी सिगरेट, सिगरेट के डिब्बे की कुछ फोटो क्लिक की. फिर जेब से माचिस निकाल एक सिगरेट सुलगाई और सुलगती सिगरेट की भिन्न-भिन्न एंगल से फोटो क्लिक की. ऐसा करते-करते तीन सिगरेट पूरी तरह जल के राख बन चुकी थी और वो 30-35 फोटो क्लिक कर चूका था. चौथी सिगरेट सुलगा कर उसे डिब्बे पर रखा और वहीँ लेट गया. लेटकर उसे देखते-देखते न जाने कब उसकी आँख लग गई.

           चारों तरफ बड़े-बड़े ज्वालामुखी जिनमें से गर्म लावा निकल रहा था. चारो तरफ माहौल काफी गर्म था. एक बड़ी-लम्बी सिगरेट हवा में तेज रफ़्तार से उडती आगे बढ़ रही थी. आशीष उसको कसकर पकड़ बैठा था. भीषण गर्मी की वजह से वो पसीने में पूरा तर हो चूका था. तभी कहीं से गर्म लावा की हल्की-सी चिंगारी हवा में उड़ते आ सिगरेट के आगे के सीरे को सुलगा गई. सिगरेट को सुलगते देख आशीष के हाथ-पाँव फूलने लगे. सिगरेट तेज रफ़्तार से आगे बढ़ रही थी और साथ ही सुलगते हुए राख में तब्दील हो रही थी. सुलगते-सुलगते आशीष की तरफ बढ़ रही थी. आशीष धीरे-धीरे पीछे खिसक रहा था. नीचे चारो तरफ लावा ही लावा देख थर-थर कांप भी रहा था. धुंए के गुब्बार से सामने कुछ भी साफ़ नहीं दिखाई दे रहा था. हवा में तेज रफ़्तार से भागती सिगरेट डगमगाने लगी. आखिरकार वो गिर गया. वो चिल्लाता हुआ तेजी से नीचे बहते लावा की तरफ गिर रहा था. लावा के एकदम करीब पहुँच चूका था. वो भयभीत-सा और तेजी से चिल्ला रहा था. वो लावा में गिरने ही वाला था कि चटाक की आवाज के साथ घबराता हुआ जगा. आँखें मसलते हुए उठ बैठा. आँखें अधखुली थी. उसने अपने बायें गाल पर दर्द महसूस किया. गाल पर हाथ रखते ही उसकी आँखें पूरी खुली और चौंकते हुए पीछे खिसका.    
            

             धुप ने अलविदा कह दिया था. चाचा उसके सामने पैरो के बल बैठे थे. छोटे-छोटे बाल, आँखों में शोले, लाल-चमकता चेहरा, मूंछे, कद 6 फीट, आशीष की आँखों में आँखें डाल गुस्से में घुर रहे थे. बगल में गाउन पहने चाची आक्रोशित नाक पर हाथ रखे खड़ी थी. चारो तरफ सिगरेट की गंध अभी भी मौजूद थी. उनके पास कौशिक खड़ा था. कुछ देर पहले जो चटाक की आवाज सुनाई दी थी वो आशीष के गाल पर चाचा का तमाचा था. वो उन सबको सहमी निगाहों से देख रहा था. उसका गला सुख रहा था. उसकी नजर फर्श पर सिगरेट के डिब्बे पर पड़ी, जिसकी चार सिगरेट राख बनी इधर-उधर उडती-बिखरी पड़ी थी. अधखुली माचिस की डिबिया व कैमरा अपनी जगह पर यथावत पडे थे. उसे महसूस होने लगा था कि अगले चंद लम्हों में उसके साथ कितना बुरा बर्ताव होने वाला हैं. कुछ सवाल-जवाब शुरू हो उससे पहले एक और चांटे ने आशीष के भीतर ज्वालामुखी को हिला डाला और आँसू रूपी लावा छलक पड़ा.

“हरामजादे, तुने सिगरेट पीना शुरू कर दिया”-चाचा चिल्लाएं. बिना सोचे समझे उसने रूहांसी शक्ल के साथ इंकार में सिर हिलाया. आशीष जोर-जोर से सिसकियाँ भरने लगा.

“तो यह सब क्या मैंने किया हैं?”-चाचा ने बाएँ हाथ से सिगरेट का डिब्बा उठाया और दाएं हाथ से आशीष का कान मरोड़ते हुए बोले. दर्द के मारे आशीष कराह रहा था.

“बोल, किसने सिखाया तुझे सिगरेट पीना?”-कान को रिहा कर बहुत-से चांटे आशीष के गाल, सिर, गर्दन पर बरस पड़े. वो चिल्ला-चिल्लाकर रोना चाहता था पर उसके मुंह से सिसकियों के सिवाय कोई और आवाज न निकल पा रही थी.

“मैंने सिगरेट नहीं पी”-आशीष बड़ी मुश्किल से लफ्ज़ निकाल पाया.

“इसकी इन हरकतों की वजह से हमारे बेटे पर गलत असर पड़ेंगा”-चाची ने आगे बढ़ चमाट मारने का मौका न गंवाया. सिसकियाँ तेज हो रही थी. गाल लाल हो चुके थे.

“नालायक तेरी इतनी हिम्मत कि हमारी गैर-मौजूदगी में गलत काम करने शुरू कर दिए, आज तेरी सारी हेकड़ी बाहर निकालता हूँ”-चाचा ने उसके कमीज़ का कॉलर पकड़ सीढियों पे घसीटते हुए नीचे लाकर फर्श पर पटका. चाची व कौशिक भी नीचे आये. कौशिक के हाथ में कैमरा था. वो उसे ऑन करने की कोशिश कर रहा था लेकिन बैटरी लॉ की वजह से ऑन नहीं हो पा रहा था. सामने दीवार पर घडी में 6 बज रहे थे.

“चाचा मैंने सिगरेट नहीं पी....सच्ची....मेरा विश्वास करो”

“शालिनी दरवाजें-खिड़कियाँ बंदकर पर्दा लगा दो, आज मैं उसकी चमड़ी उदेड दूंगा”-इतना कहते ही चाची ने दरवाजे-खिड़कियाँ बंदकर पर्दे लगाए और चाचा ने अपने पेंट में से बेल्ट निकाली.

आशीष ने थूक निगला. उसकी सिसकियाँ रुक गई. आँसू भी जहाँ थे वहीँ सुख गए. हाथ अनायास ही विनती में चाचा के सामने जुड़ गए. भयभीत नजरें बेल्ट के किसी बिंदु पर आकर रुक गई.

उसकी दरख्वास्त खाली गई. एक लम्बी चीत्कार.... शरीर की नसों में रक्त अपना रास्ता बदलने लगा.... धडकने कभी तेज.... तो कभी रूकती.... फिर उल्टे पाँव लौटती.... फिर तेजी से धडकने लगती.... बिंदु  ओझल होने लगा था.... आँखें धीरे-धीरे बंद होने लगी....

....फिर एक और चीत्कार.... उसके लुप्त होते ही आँखें ने भी स्वयं को समेटना बेहतर समझा.... होंठो को भींचते-भींचते फर्श पर वो स्वयं के आगोश में ही सिमट गया....

जब आँखें खुली तो उसने खुद को एक अंधेरे कमरे में अकेला पाया. वो घर का स्टोर रूम था. चारो तरफ कुछ भी ठीक से नजर नहीं आ रहा था. स्टोर-रूम में रोशनदार भी नहीं था. कीड़े-मकोडों की अजीब तरह की धीरे-धीरे आवाजे आ रही थी. डर के मारे उसके जेहन में कंपकंपी छुटी. उसे अंधेरे से बहुत डर लगता था. उसकी पीठ व गाल दर्द के मारे जल रहे थे. उससे खड़ा ही नहीं हुआ जा रहा था. तभी उसने अपने हाथ पर किसी को चढ़ते पाया. उसने उसे छुआ तो उसे गिला सा महसूस हुआ. वो एक छिपकली थी. उसने फटाक से उसे अपने से दूर कर चिल्लाया. धडकने उल्टे पाँव उस छोर तक पहुँच चुकी थी जिस छोर के बाद धडकनों की जरुरत नहीं पड़ती. वो दुबारा बेहोश हो गया. घड़ी के 12 घंटे बजने से प्रतीत हुआ की रात की 12 बज चुकी थी और साथ ही आशीष की भी.

कुछ घंटो के बाद उसे दुबारा होश आया तब भी उसने स्वयं को वहीँ पाया. घडी के घंटे बजते ही ही वो डरा. उसकी साँसे पहले के मुकाबले अब काफी तेजी से चल रही थी. सुबह की 5 बज चुकी थी. वो बड़ा मुश्किल से खड़ा हो पाया. दर्द के मारे उसके मुंह से चीख निकली. उसने दरवाजा खटकाया. अपने चाचा-चाची को आवाज दी की प्लीज मुझे यहाँ से बाहर निकालो. उसने कौशिक को भी आवाज दी. पर कोई उसकी सुध लेने नहीं आया. वो उस अंधेरे से स्टोर-रूम में भयभीत-सा, भूखा, छिपकलियों से लड़ता, चिल्लाता, रोता पुरे चार दिन रहा. इसी बीच उसके डम्बल्डोर का भी फोन आया था लेकिन चाचा ने कह दिया कि आशीष स्कूल के बच्चो के साथ पिकनिक पर गया हैं. उन चार दिनों में उसकी हड्डियाँ पहले से ज्यादा बाहर दिखने लगी थी. तकरीबन 34 बार डर के मारे बेहोश हो चूका था.

34 वी बार बेहोशी के बाद जब उसकी आँख खुली तो उसने खुद को अपने कमरे में पलंग पर लाश की तरह पड़ा पाया. दो दिन तक उसने खुद को भूखा-प्यासा कमरे में बंद पलंग पर करवटों में व्यस्त रखा. चाचा-चाची ने परवाह की नहीं और उसमें उठने का सामर्थ्य था नहीं.

तीसरे दिन जब वो कमरे से बाहर निकला तो आशीष पूरा बदल चूका था. वो अब पहले जैसा आशीष नहीं, शून्य बन चूका था. हर पल चुप-चुप सा रहता. खाने को जो देते वो खा लेता. दुबारा नहीं मांगता. स्कूल से लौटते ही होमवर्क करता, फिर पुरे वक़्त पलंग पे एक लाश की तरह पड़ा रहता. कहीं बार पलंग पर पड़ा-पड़ा हाथ-पाँव हिलाते हुए मचलता था, रोता था, मानो कोई उसका गला घोंट रहा हो. लेकिन उसकी पुकार सुनने वाला कोई नहीं था. वो भूल चूका था कि कैमरे में मौजूद उसके माता-पिता उसका अनाथ गम दूर किया करते थे.

उसकी पीठ पे नीले निशान अभी भी मौजूद थे. उन निशान ने उसके भीतर एक जहर का काम किया, कीड़ों को मारने वाला जहर. वो बैनर पढना भूल चूका था. गर्दन नीचे किये स्कूल आता-जाता. कंचे फेंक दिए. ताश के ५२ पत्ते पुरे करने का लक्ष्य टॉयलेट में फ्लश हो चूका था. इश्तहार जला दिए थे.

लेकिन वो एक चीज़ नहीं भुला पाया तो वो था अँधेरा. उसके जेहन के भीतर अँधेरा समा चूका था. उसे हर रात अंधेरे में डूबे भयानक सपने आते. वो चीखते हुए जाग उठता, फिर उसे पूरी रात नींद नहीं आती. वो छोटी सी उम्र में ही अनिद्रा का शिकार हो चुका था. जिस वजह से उसका सिर बेरहमी से दर्द करता. वो बहुत बार बेहोश हो जाया करता था.

डम्बल्डोर के फ़ोन भी आते तो वो पहले जैसे हँसते-खिलखिलाते बातें नहीं करता, बस हाँ-ना करते फ़ोन रख देता. अपने साथ पिछलें दिनों जो कुछ घटित हुआ वो भी उसने उन्हें नहीं बताया, यह भी नहीं कि फिलहाल वो कैसी भयानक परिस्तिथि से गुजर रहा हैं.

बचपन से ही उसके जेहन में अपने दादाजी से एक सवाल था, जो वो कभी पूछ नहीं पाया. शायद उसे उसकी कभी जरुरत ही महसूस नहीं हुईं. आखिर एक दिन उसने पूछ ही लिया कि “आपने एक बार कहा था कि आपको अमेरिका जाना कतई पसंद नहीं था फिर आप वहां क्यूँ गये? और आप मुझसे इतना प्यार करते हैं तो मुझे अपने साथ अमेरिका क्यूँ नहीं ले गये?”. जो जवाब मिला, उस सच ने आशीष के मन को कचोटते उसमें एक नयी चेतना जगा दी.

डम्बल्डोर ने उसे बताया की “उसके माता-पिता की मौत के बाद उन्होंने फैसला किया कि तुम्हारी ज़िम्मेदारी बड़े बेटे को देंगे और वो स्वयं छोटे बेटे के साथ अमेरिका रहेंगे चाहे उन्हें पसंद हो या नहीं,  लेकिन अमेरिका पहुँच कर छोटे बेटे ने उन्हें अपने घर में रखने से इनकार कर दिया और बड़े बेटे ने शर्त रखी कि आशीष और उन में से किसी को एक को अपने पास रख सकते हैं और डम्बल्डोर आशिष की परवरिश के खातिर कभी भारत नहीं लौटे और वो पिछले 8 सालों से अमेरिका में वृद्धाआश्रम में रह रहे थे”.

आशीष ने उदासी भरे स्वर में पूछा “आपने ऐसा क्यूँ किया?”. डम्बल्डोर का जवाब था “ज़िन्दगी में कभी उम्मीद मत खोना, उम्मीद हैं तो सब हैं, लेकिन कभी-कभी वक़्त ऐसे नगमे पढाता हैं कि उम्मीद खत्म हो जाती और जिस दिन ज़िन्दगी से उम्मीद खत्म हो जाए उस दिन स्वयं को ज़िन्दगी के हवाले कर देना और मैं हमेशा के लिए अमेरिका वृद्धाआश्रम रुक गया.”

                      उम्मीद लफ्ज़ ने आशीष के अंदर एक बुझी हुईं चेतना जगा दी और उसने डम्बल्डोर से जिद की कि वो अब अकेला हॉस्टल में रहना चाहता हैं. वो खुद को भी ऐसे मोड़ पे पा रहा था जहाँ से अपने हालातों से लड़ उन्हें चित्त कर जीतने की उम्मीद बची नहीं थी, इसलिए उसने सोचा कि दादाजी की तरह खुद को ज़िन्दगी के हवाले करने के लिए अकेलेपन से बेहतर और कोई तरीका नहीं था.


                     कुछ दिनों के बाद दादाजी के आदेश पर चाचा ने उसे हॉस्टल में भर्ती करवा दिया. लेकिन अभी भी कुछ नहीं बदला था. पलंग पर लाश की तरह पड़े मचलना, सपने, अनिद्रा, सिर-दर्द, बेहोश होना, सब अभी भी जारी था. कई बार वो क्लास में बेहोश हो जाता था. स्कूल प्रशासन ने कई बार उसके चाचा को कॉल कर आशीष को अपने साथ घर ले जाने को कहा, लेकिन वो नहीं आये. बच्चे भी उससे डरने लगे थे कि वो किसी भयानक बिमारी से पीड़ित हैं, इसलिए कोई भी उसके पास बैठना व बात करना पसंद नहीं करता था और आशीष ने कभी उसकी जरुरत भी न समझी, वो तो बस अकेला गुमशुम अपने काम में मशगुल एक अलग ज़िन्दगी बसर कर रहा था. वो लड़ रहा था स्वयं के भीतर मौजूद रात के अंधेरों से, बिना उम्मीद के कि कभी सुबह होंगी और उजाला होंगा.

                    2 साल बीत गए. कोई उसकी सुध लेने नहीं आया. वो दसवीं कक्षा में आ चूका था. बड़ा और समझदार भी हो गया था. डम्बल्डोर ने दुनिया को अलविदा कह दिया था. चाचा ने रूपये भेजने बंद कर दिए. डम्बल्डोर के गुजरने के बाद उसकी स्कूल और हॉस्टल फीस कौन भर रहा था उसने कभी जानने की चेष्टा भी नहीं की. सबकुछ बदल गया था सिवाय एक चीज़ के.... अँधेरा अब भी जेहन में कायम था.

                    एक दिन वो सड़क से गुजर से रहा था तो चाय की थडी पर बैठे सिगरेट पी रहे उसके कुछ सहपाठीयों ने आवाज दी. आशीष उनके पास गया. दो साल बीतते-बीतते उसमें सबसे बड़ा बदलाव यह आया था कि जब कोई आगे से उससे बात करता तो वो कर लेता था वरना उसे किसी से कोई मतलब नहीं था. उन्होंने एक स्टूल आशीष की तरफ किया. आशीष उस पर बैठा. उन्होंने एक सुलगती सिगरेट उसकी तरफ बढाई. आशीष ने निसंकोच उसे लिया. उसने ज़िन्दगी में पहली बार सुलगती सिगरेट को होंठो से लगाया था. धुंए को अंदर खींचते वक़्त उसे वो छत वाला दृश्य याद आ रहा था, साथ ही वो अँधेरी रातें. कश लेते ही धुएं का गुब्बार हवा में छोड़ा. हर एक कश खींचने पर उसे एहसास होता कि जेहन में धुंए संग अँधेरा बढ़ रहा हैं, लेकिन जैसे ही वो धुएँ का गुब्बार हवा में छोड़ता, खुद को पहले से बेहतर महसूस करता, मानो धुएँ के गुब्बार उसके भीतर समाये हुए अंधेरे को अपने साथ कहीं दूर ले जा रहे हो.

                 उसने एक नजर धुंए के गुब्बार पर डाली, फिर एक नजर जमीन पर बिखरती राख पर. आशीष मुस्कुराया. वो दो सालों में पहली बार मुस्कुराया था और उसके होंठो से अनायास ही लफ्ज़ निकल पड़े....


“ज़िन्दगी साली सिगरेट की तरह होती हैं.... बस एक बार सिर्फ सुलगने की देर हैं.... दो चीजों के सिवाय कुछ नहीं मिलता.... एक ज़िन्दगी का गला घोंट देने वाला धुआं.... तो दूसरा अतीत की काली स्मृतियों की राख, जो वक़्त के झोंको के साथ हवा में बिखरती दूर तो चली जाती हैं पर मिटती नहीं”.