घने बादलो के बीच सूरज की हल्की-हल्की किरणों से अँधेरी रात का खूनी चेहरा उजागर हुआ, सड़क, दुकानों की दीवारों पर छोटे-बड़े, हल्के-गहरे खून के धब्बे दिखाई दे रहे थे. कई अनगिनत बुलेट्स सड़क पर खामोश बिखरी रही, तो कई बुलेट्स दीवारों में समायीं दुनिया वालो से अपनापन जता रही थी की उन्होंने उनके किसी अपने की जान बख्स दी. पुलिस ने सड़क को दोनों तरफ से सील कर दी थी. एक पुलिस की गाड़ी और स्कार्पियो वहां क्षतिग्रस्त खड़ी थी. आस-पास की सभी दुकाने बंद दी थी. 3-4 पुलिसवाले अभी भी मौके-ए-वारदात पर मौजूद थे. सड़क के पास ही रेलवे ट्रैक था और उसके दूसरी तरफ बसी थी झुपरपट्टी.


           झुपरपट्टी पहले कभी इतनी खामोश नहीं थी. बच्चों के शोर से हर पल यह एहसास होता रहता की कच्चे मकानों की कच्ची दीवारें को कच्ची उमर ने पक्का बना रखा था. लेकिन पिछली रात के बंदूको के शोर ने शायद इन बच्चों के शोर को निगल लिया था. झुपरपट्टी के बीचो-बीच एक कच्चे मकान से दो आँखें दीवार से चिपकी बाहर की और देख रही थी, शायद दिल में बसे डर को कम करने का बीड़ा आँखों ने उठाया था, वो दायें-बायें किसी सहारे को ढूंढ रही थी लेकिन चारो तरफ खामोशी ही खामोशी. वो दोनों आँखें घर के भीतर मायूस लौटी. 14 साल का ‘कबीरा’ चारपाई का सहारा लेकर बैठ गया. उसके माथे पर सलवटे साफ़ जाहिर कर रही थी की वो उदास था की कब तक सब बच्चे घरो में दुबके रहेंगे? वो आजाद पंछी की तरह उड़ना चाहता था लेकिन बिन सहारे व मन में बसे डर ने उसके पंखों को झकड़ रखा था. उसका शराबी पिता चारपाई पर लेटा था, माँ चूल्हे पर खाना बना रही थी. 15 साल का उसका बड़ा भाई ‘फारुख’ माँ के पास बैठा गोटियों(कंचे) से खेल रहा था. तभी अचानक एक गोटी उछलते हुए आटे की थाली में जा गिरी....
बाहर मर, बाहर मर माँ ने बेलन से फारुख के पीठ पर मारते हुए कहा और गोटी को उठा कबीरा की तरफ फेंका.

कबीरा हँसने लगा.
माँ बेवजह मत मारो फारुख की गुस्से में नजर हँसते हुए कबीरा पर थी.
कबीरा उसकी तरफ फेंकी हुई गोटी को उठाता हैं.
सुबह से यहाँ बैठा छाती पर चवले दल रहा हैं, बाहर जाकर खेल ना
बाहर कोई न खेल रहा हैं माँ, डर के मारे सब घर में छिपे हैं
कबीरा, फारुख के पास पड़ी गोटी पर निशाना साधने की तैयारी में था.
कैसा डर? बाहर तुम्हारी कोई इज्ज़त.... कबीरा का निशाना चूका और गोटी सीधा दाल के भगोने में जा गिरी. माँ ने बात बीच में रोकते बेलन हाथ में लिए खड़ी हुई और कबीरा की तरफ भागी, तब तक कबीरा घर के बाहर पहुँच चुका था.
भागता कहाँ हैं, चुचुंदर की औलाद, दाल खाने तो घर पे ही मरेगा दरवाजे के पास खड़ी कबीरा को भागते हुए देख रही थी.
कबीरा बेबाक अंदाज़ में भाग रहा था और तभी बारिश शुरू हो गई. कबीरा ने अपने कदमों को विराम दे आसमान की तरफ देखा, तभी उसके पीछे दुसरे बच्चो के घर से बाहर भागते हुए आने का शोर सुनाई दे रहा था. शायद वो भी कबीरा की तरह किसी के घर से बाहर निकल नेतृत्व का इंतज़ार कर रहे थे. कबीरा ने बारिश को चीरते हुए फिर से भागना शुरू किया, पर इस बार वो अकेला नहीं था बाकी सारे बच्चे उसके पीछे थे.
             दो घंटे के बाद बारिश थमी. बारिश की बूंदों ने बच्चो के सीने में छुपे डर को रगो में रिसते हुए पैरो की उंगुलियों तले भगा दिया था. अब वक़्त हो चला था गोटियाँ खेलने का. फारुख ने ज़मीन पर उंगुली से बड़ा सा घेरा बनाया और जो खेलना चाहते हैं उनसे दो-दो गोटी माँगी. खेल बस यह था की घेरे में पड़ी गोटियों पर निशाना लगाना हैं जो बाहर निकली वो अपनी.

मुझे भी खेलना हैं कबीरा भागता हुआ आया.
दो गोटी दे फारुख के पास खडा लड़का बोला.
 नहीं हैं
तो भाग यहाँ से
फारुख तू उधार दे दे, मैं जीतकर वापस दे दूँगा
तू जीतेंगा, शक्ल देखी हैं अपनी फारुख ने कबीरा को धक्का मार गिरा दिया, पास खड़े सभी हँसने लगे.
धक्का क्यूँ मारा? कबीरा अपने दोनों हाथ पिछवाड़े पर फेरते, मुँह बिगाड़ते हुए बोला.
सुबह बड़ी हँसी आ रही थी ना जब माँ ने मुझे बेलन से मारा था, अब चला जा यहाँ से वरना बहुत पीटेगा
              कबीरा उठा, आँखों में हल्की बूंदों को पोंछते हुए धीमे कदमों से वहां चला गया. गुमशुम, उदास अकेला पटरियों के वहां जा पहुँचा. कभी पटरी पर अपना बैलेंस बनाते हुए चलता तो कभी रेलवे-ट्रैक पार करने के लिए बने पैदल-पुल के बीचो-बीच खड़ा होकर मूत्र-विसर्जन करता. अपनी मस्ती में घूमते वो पटरियों के पार सड़क पर जा पहुँचा जहाँ पिछली रात गोलियां चली थी. सड़क पर यातायात सामान्य हो चुका था. बारिश से बुलेट्स बह चुकी थी, तो खून के धब्बे हल्के पड गए थे. कबीरा हल्के खून के धब्बो से डर रहा था लेकिन उसके करीब जाने की चाह को भी रोक नहीं पा रहा था. तभी उसकी नजर एक पान की दूकान के नीचे फर्श पर पड़ी, कोई चमकीली चीज उसे अपनी तरफ आकर्षित कर रही थी. कबीरा उसकी तरफ भागा. उसने पास जाकर देखा तो वो एक गोटी थी आम आसमानी-हरी-काली गोटियों से एकदम अलग सामान्य कांच की जो काफी चमक रही थी. कबीरा ने उसे उठाया, काफी देर तक अजीब निगाहों से उसे घूरता रहा. फिर अचानक ख़ुशी में उछलना लगा, क्यूंकि उसे ऐसी गोटी मिलीं जो झुपरपट्टी में किसी के पास भी नहीं थी. वो ख़ुशी के मारे उछल-कूद करते झुपरपट्टी की तरफ भागा.
अभी भी सभी बच्चे वहीँ खेल रहे थे,

देखो मेरे पास क्या हैं? कबीरा ने सबका ध्यान अपनी और खिंचा, कबीरा ने अपने दोनों हाथों को जोड़े फैलाए हुए चमकीली गोटी सबको ख़ुशी-ख़ुशी दिखा रहा था. सभी बच्चे आश्चर्यचकित हो गये, ऐसी चमकदार गोटी इससे पहले उन्होंने कभी न देखी थी. कबीरा की आँखें उस गोटी की चमक के साथ ऐसे चमक रही थी जैसे समुन्द्र से पारस पत्थर ले आया हो.
मुझे दिखा, मुझे दिखा सब बच्चों में चमकीली गोटी देखने की जद्दोजहद लगी थी.
फारुख ने उसे उठाने के लिए हाथ आगे बढ़ाया तो कबीरा ने मुट्ठी बंद कर दी.
छुने के लिए नहीं मेरी चमकीली गोटी, खरीदनी पड़ेंगी
5 गोटी दूँगा मैं इसके बदले फारुख बोला.
मैं 6 दूँगा फारुख का दोस्त बोला.
     बोलिया लगनी शुरू हो गई थी. आखिरकार फारुख ने उसे 25 गोटी के बदले खरीदा. कबीरा ने बुझे मन से वो चमकीली गोटी फारुख को दी, लेकिन उसे उन सबके संग खेलना था. वो सोच रहा था की अगर और गोटियाँ जीत गया तो फारुख से दुगनी सौदे में वापस ले लूँगा. कबीरा भी उनके साथ खेल में शरीक हो गया.
      खेलते वक़्त कबीरा का दिल-दिमाग उस चमकीली गोटी में अटक हुआ था. वो खेल एकाग्रता से खेल नहीं पाया और 25 की 25 गोटियाँ हार गया. उदास मन से पास के एक बड़े पत्थर पर जाकर बैठ गया. सब बच्चे अपने-अपने घरो को जा चुके थे लेकिन कबीरा पत्थर पर बैठा गीली मिट्टी में उंगुली फिरा रहा था.
      रात को दोनों भाई पास-पास ही अपने-अपने बिस्तरों पर लेटे थे. फारुख उस चमकीली गोटी को अपनी उंगुलियों के बीच फिरा रहा था.
भाई, एक बार मेरे को देना कबीरा अभी भी खुद को उस चमकीली गोटी के आकर्षण से छुटकारा न दिला पाया था.
चुपचाप सोजा वरना एक चमाट पड़ जायेंगी
भाई के डर से कबीरा ने चद्दर ओढ़ ली, लेकिन चद्दर को थोडा ऊपर कर एक आंख से चमकीली गोटी को निहार रहा था. उसकी एक आँख में उस चमकीली गोटी को छुने की बैचेनी साफ़ झलक रही थी. कुछ ही पल में फारुख को नींद आ गई. वो चमकीली गोटी उसकी बंद मुट्ठी में कैद थी. कबीरा अभी तक सोया नहीं था वो फारुख के सोने का इंतज़ार कर रहा था. उसका इंतज़ार ख़त्म हुआ. धीरे से उसने अपने ऊपर से चद्दर को हटाया और फिर फारुख करीब जाकर उसकी बंद मुट्ठी को धीरे से खोल चमकीली गोटी निकाल ली. अब उसका चेहरा पहले से ज्यादा चमक रहा था. फिर से वो अपनी चद्दर में घुस गया और चमकीली गोटी को अपने आँखों के सामने रख उसे देखता-देखता चमकीले सपनो में खो गया.
          अगली सुबह फारुख जगा तो अपनी खुली मुट्ठी को चमकीली गोटी बिना देख परेशान होने लगा. कबीरा अपने बिस्तर पर नहीं था.
माँ तुमने मेरी चमकीली गोटी देखी आँखें मसलता हुआ बोला.
कबीरा खेल रहा था थोड़ी देर पहले यहीं पर
           कबीरा का नाम सुनते ही फारुख गुस्से में उठा और घर से बाहर भागा. रास्ते में जो मिले उससे कबीरा के बारे में पूछ रहा था, लेकिन सबने उसे देखे जाने के बारे में इनकार किया. उसने कबीरा को पूरी झुपरपट्टी में ढूंढा. ढूंढते-ढूंढते रेलवे स्टेशन जा पहुँचा. उसने पैनी नजर से चारो तरफ देखा लेकिन वो कहीं नहीं दिखा. थकान की वजह से वो कुर्सी पर बैठा, उसकी नजर पास की कुर्सी पर अखबार के टुकड़े पर जा गिरी. उसने उसे उठाया, गौर से पढने लगा और उसकी आँखें फटी की फटी रह गई. तभी उसकी नजर सामने के प्लेटफार्म पर घूम रहे कबीरा पर पड़ी. कबीरा चमकीली गोटी से खेल रहा था. एक हाथ से उछालता, दुसरे हाथ से लपकता, फिर दुसरे से उछालता, पहले से लपकता.
कबीरा............. फारुख ने चिल्लाकर आवाज लगाईं. कबीरा ने फारुख की तरफ देखा और चमकीली गोटी को नेकर की जेब में रख उसे अनदेखा कर भागना शुरू किया. फारुख ने भी देर न की. दोनों एक ही दिशा में समान्तार भाग रहे थे पर अलग-अलग प्लेटफार्म पर. अखबार का टुकड़ा फारुख के हाथ में ही था. कबीरा और फारुख दोनों पुल की सीढियाँ चढने लगे. सीढियाँ ख़त्म होते ही दोनों भागते हुए पुल पर बायीं तरफ मुड़े. कबीरा आगे, फारुख पीछे. दोनों भागते-भागते आखिरी प्लेटफार्म पर सीढियाँ से उतरे.

कबीरा रुक ना फारुख हाँफते हुए आवाज दे रहा था.
नहीं रुकुंगा मुझे पता हैं तू मारेगा कबीरा ने पलटकर जवाब दिया, लेकिन उसका भागना जारी था.
प्लेटफार्म ख़त्म हो चुका था. दोनों दो अलग-अलग पटरियों के बीच भाग रहे थे.
कबीरा मेरे भाई रुक जा
नहीं भाई, मैं तुझे वो चमकीली गोटी नहीं दूँगा
अरे मैं तुझे नहीं मारूंगा रुक तो जा
          पत्थर की ठोकर लगते ही कबीरा गिर गया. फारुख उस तक पहुँच चुका था.कबीरा ज़मीन पर गिरा हुआ था. फारुख उसके पास अपने घुटनों पर हाथ रख झुके हुए खड़ा था. दोनों की साँसे तेज़ चल रही थी. बायीं तरफ की पटरी पर लोकल ट्रेन स्टेशन की ओर गुजर रही थी, तो दायीं तरफ की पटरी पर लोकल ट्रेन स्टेशन से छुटी थी. दोनों ट्रेनों के एक साथ गुजरने से तेज हवा के झोंको से कबीरा के हाथ में अखबार की टुकड़ा लड़ रहा था.
चमकीली गोटी कहाँ हैं फारुख सामान्य लहजे से ही पूछा.
मैं नहीं दूँगा कबीरा ने अपने नेकर की जेब को पकड़ लिया.
अरे मेरे भाई तुझे पता नहीं हैं वो चमकीली गोटी क्या हैं
चमकीली गोटी हैं और क्या, झुपरपट्टी में किसी के पास भी नहीं
अरे बुद्धू वो चमकीली गोटी, गोटी नहीं, बल्कि करोड़ों की चीज़ हैं, हीरा
           हीरा शब्द सुने ही कबीरा के चेहरे का रंग उड़ गया, पर आँखों की चमक बढ़ गई.

क्या मजाक कर रहा भाई कबीरा को अभी भी फारुख की बात पर विश्वास नहीं हो रहा था.
अरे मजाक नहीं सच कह रहा हूँ, यह अखबार देख
कबीरा जोशीले अंदाज़ में खड़ा होता हैं. फारुख अखबार का टुकड़ा उसकी तरफ बढाता हैं.
मुझे पढना आता हैं क्या जो तू मुझे दे रहा हैं तू पढ कर सुना, पांचवी पास हैं तू
तुझे यह चमकीली गोटी कहाँ से मिली थी?
काबरा रोड से
जहाँ पर उसकी पिछली रात गोलियां चली थी
हाँ भाई
उस रात पुलिस और लूटेरो के बीच लड़ाई हुई थी. उन लूटेरा ने एक जवेलेरी की दूकान से दकसीन अफरीका के हीरे चुराए थे फारुख अखबार के टुकड़े में समाचार की पंक्तियों पर उंगुली से इंगित कर पढ़ रहा था, कबीरा ऐसे देख रहा था जैसे हीरे का नाम सुनते ही उसमें एक अजीब शक्ति आ गई हो और उससे पढ़ा जा रहा हो.
यह देख फोटू देख
भाई यह तो 25-30 चमकीली गोटियाँ हैं, बिल्कुल अपने पास चमकीली गोटी हैं वैसी ही
गोटियाँ नहीं, हीरे
मतलब भाई अपन पैसों वाले बन गए करोड़पति कबीरा ख़ुशी के मारे फारुख से लिपट गया.
हाँ कबीरे
मैंने तो सोचा था अल्लाह अपन जैसे झुपरपट्टी के वालो के बारे में सोचता नहीं
पर आज सोचा उसने
हाँ भाई
कबीरा फारुख के चारो तरफ घूमते हुए नाच रहा था, फारुख एक अलग ही रईसी अंदाज़ में हँस रहा था. फारुख ने कबीरा को हाथ पकड़कर पटरी पर बिठाया. दोनों आज से पहले इतना खुश कभी नही थे.
भाई अपन इतने रुपयों का क्या करेंगे? फारुख के कंधे पर हाथ रख कबीरा बोला.

तू बोल छोटे
एक बड़ा सा घर बनायेंगे, उसे क्या कहते हैं?
बंगला
हाँ वो ही, फिर एक बड़ी सी गाड़ी खरीदेंगे, बापू चलाएंगे, मैं उनके पास बैठूँगा, तू माँ के साथ पीछे पास बैठना
नहीं मैं आगे बैठूँगा’
ठीक हैं तू बड़ा भाई, तू आगे बैठना और फ़िल्मों वाले कपडे पहनेंगे, कमीज़ के सारे बटन खुले, अंदर वो पहनेंगे क्या बोलते हैं उसे?
टी-शर्ट
हाँ वो ही
वैसे तू एक चीज़ भूल गया
क्या भाई?
अपन उस दिन किसी रईस की शादी में खाना चुरा रहे थे तब उनके पास एक हरे रंग की बड़ी बोतल थी जिसको उन्होंने हिलाया तो बहुत तेजी से फव्वारा, बहुत सारा झाग निकला था. अपन भी वो लायेंगे और पीयेंगे
हाँ भाई, यह तो मैं भूल ही गया, पुरे फव्वारे से झुपरपट्टी को धो देंगे, हाहाहा कबीरा बिजली से रफ़्तार के साथ उछलते हुए खड़ा हुआ. फारुख ने अखबार का टुकड़ा हवा में उड़ा दिया.
भाई इस हीरे को कीमत कितनी होंगी
कबीरा, मैंने तो सुना हैं हीरे की कीमत कोई नहीं बता सकता
सच मतलब अपन सबसे बड़े पैसों वाले, भाई मैं तो कहता हूँ अपन पूरी झुपरपट्टी खरीद लेंगे, यहाँ के बॉस बन जायेंगे
चल अब वो चमकीली गोटी तो दिखा
भाई हीरा बोलो हीरा
हाँ वो ही रे, दिखा अब
फारुख पैदल पुल को देखने लगा. कबीरा ख़ुशी-ख़ुशी जेब में हाथ डालता हैं. फिर उस जेब से हाथ निकाल दुसरे जेब में डालता हैं. उसका खुशनुमा चेहरा डूबने लगा था. वो अपने हाथ को जेब के आखिर हिस्से तक छु कर देख रहा था लेकिन गोटी जेब में नहीं थी. उसकी ख़ुशी छुमंतर हो चुकी थी. कबीरा ने जेब में बार-बार हाथ डाला पर हर बार निराशा हाथ लगी. उसकी आँखें रोने सी होने लगी थी.
क्या हुआ? फारुख ने उसकी तरफ देखकर बोला.
भाई, गोटी तो जेब में हैं ही नहीं
क्या बकवास कर रहा हैं? फारुख गुस्से में खड़ा होता हैं. कबीरा के जेब में हाथ डालकर देखता.
प्लेटफार्म पर जब मैंने तुझे देखा तब तो तेरे पास ही थी
हाँ भाई, फिर मैंने जेब में डाल दी थी
फिर कमीने कहाँ गिरा दी फारुख ने गूसे में कबीरा को घूंसा मारा और कबीरा ज़मीन पर गिरते ही रोने लगा.
       फारुख इधर-उधर ढूंढने लगा, पटरियों के वहां पड़े पत्थरों को हटाते हुए. कबीरा भी रोते-रोते ढूंढ रहा था. फारुख उस पर गुस्से में गालिया दे रहा था और मार भी रहा था. जिस रास्ते से वो भागते आये थे पुरे रास्ते को उन्होंने ढूंढा. फारुख गुस्से में कबीरा पर चिल्लाता जा रहा था, पर कबीरा कुछ नहीं बोल रहा था रोने के सिवा. फारुख की शक्ल डूबते सूरज जैसी हो गयी थी. वो बेजान की तरह प्लेटफार्म के फर्श पर बैठ गया. कबीरा का रोना अभी भी चालु था, इसलिए नहीं की फारुख ने उसे मारा, बल्कि इसलिए की हाथ में आया खजाना उसकी गलती की वजह से उन्होंने खो दिया था, जिस जगह कबीरा ठोकर खा गिरा था, चमकीली गोटी वहीँ पत्थरों के बीच गहराई में उतर गई थी. फारुख की आँखें साफ़ जाहिर कर रही थी की उसे चमकीली गोटी के खोने जाने की बात पर अभी भी विश्वास नहीं हो रहा था. आख़िरकार वो खुद को रोक नहीं पाया और धीरे–धीरे सिसकियों के साथ रोना आरम्भ किया जो जल्द ही फुट-फुट कर रोने में तब्दील हो चूका था. फारुख और कबीरा के आंसुओं के साथ उनके सारे सपने बड़ा बंगला, बड़ी गाड़ी, फ़िल्मी कपडे, फव्वारे वाली बोतल, झुपरपट्टी का बॉस सब बह चुके थे. दिल में धडकनों के साथ कुछ सुनाई दे रहा था तो वो था झुपरपट्टी में खेलते वक़्त गोटियों के टकराने की आवाज, जो आमतौर पर चमकती नहीं थी, उसे चमकाने के लिए खेल में जीतनी पड़ती थी.


        शाम होने आ चुकी थी, दोनों अभी भी आंसुओ में डूबे वहीँ बैठे थे. कहीं दूर मस्जिद में कव्वाली कार्यक्रम का आगाज हो चूका था, जिसकी पंक्तिया प्लेटफार्म पर साफ़ सुनाई दे रही थी....

हर जगह तो रहमत की बात होती हैं....
पर खुदा के दरबार में बरसात होती हैं....
जब भी तेरे दर पे यूँ फ़रियाद होती हैं....
तेरी दुआ हर गरीब के साथ होती हैं.....

नसीब ने इन्हें हलाल कर दिया...
तेरी रहमत ने मालामाल कर दिया....
देकर टुकड़ा कांच का कोहराम कर दिया....
सेहरा की रोशनी को तूने शाम कर दिया....
शाम कर दिया.... तूने शाम कर दिया!!!!

तेरी रहमत का इशारा भी बहुत हैं....
एक डूबते को तिनका का सहारा बहुत हैं....
पर यह क्या यह तो सहारा भी फकत हैं....
फिर सहारा से ढूंढने का वकत हैं....

खुशियां भी छिनी....
छीन लिया खुशियों का सिलसिला....
तोड़ दिया वो ख्वाब....
जो उसे ख्वाब में मिला....
जो उसे ख्वाब में मिला!!!!

दूर मुश्किल गरीबोँ की होती नहीं....
तेरी रहमत सभी पर यूँ होती नहीं....
बस किस्मत गरीबी की रोती रही....
दुआए फूटपाथ पर ही सोती रही....

लिखा हैं गरीबी में....
बस दुखों का ही झेलना....
जो खुशियां दे....
वो फिर कभी खुशियां न छीनना....
खुशियां न छीनना.... कभी खुशियां न छिनना!!!!


Kawaali lines written by my brother VIJENDRA JOSHI . Warmful Thnkx.