2017

2016

2015

2014

Home » July 2013
द शाइनिंग गोटी


           घने बादलो के बीच सूरज की हल्की-हल्की किरणों से अँधेरी रात का खूनी चेहरा उजागर हुआ, सड़क, दुकानों की दीवारों पर छोटे-बड़े, हल्के-गहरे खून के धब्बे दिखाई दे रहे थे. कई अनगिनत बुलेट्स सड़क पर खामोश बिखरी रही, तो कई बुलेट्स दीवारों में समायीं दुनिया वालो से अपनापन जता रही थी की उन्होंने उनके किसी अपने की जान बख्स दी. पुलिस ने सड़क को दोनों तरफ से सील कर दी थी. एक पुलिस की गाड़ी और स्कार्पियो वहां क्षतिग्रस्त खड़ी थी. आस-पास की सभी दुकाने बंद दी थी. 3-4 पुलिसवाले अभी भी मौके-ए-वारदात पर मौजूद थे. सड़क के पास ही रेलवे ट्रैक था और उसके दूसरी तरफ बसी थी झुपरपट्टी.


           झुपरपट्टी पहले कभी इतनी खामोश नहीं थी. बच्चों के शोर से हर पल यह एहसास होता रहता की कच्चे मकानों की कच्ची दीवारें को कच्ची उमर ने पक्का बना रखा था. लेकिन पिछली रात के बंदूको के शोर ने शायद इन बच्चों के शोर को निगल लिया था. झुपरपट्टी के बीचो-बीच एक कच्चे मकान से दो आँखें दीवार से चिपकी बाहर की और देख रही थी, शायद दिल में बसे डर को कम करने का बीड़ा आँखों ने उठाया था, वो दायें-बायें किसी सहारे को ढूंढ रही थी लेकिन चारो तरफ खामोशी ही खामोशी. वो दोनों आँखें घर के भीतर मायूस लौटी. 14 साल का ‘कबीरा’ चारपाई का सहारा लेकर बैठ गया. उसके माथे पर सलवटे साफ़ जाहिर कर रही थी की वो उदास था की कब तक सब बच्चे घरो में दुबके रहेंगे? वो आजाद पंछी की तरह उड़ना चाहता था लेकिन बिन सहारे व मन में बसे डर ने उसके पंखों को झकड़ रखा था. उसका शराबी पिता चारपाई पर लेटा था, माँ चूल्हे पर खाना बना रही थी. 15 साल का उसका बड़ा भाई ‘फारुख’ माँ के पास बैठा गोटियों(कंचे) से खेल रहा था. तभी अचानक एक गोटी उछलते हुए आटे की थाली में जा गिरी....
बाहर मर, बाहर मर माँ ने बेलन से फारुख के पीठ पर मारते हुए कहा और गोटी को उठा कबीरा की तरफ फेंका.

चाइना मोबाइल

यात्रीगण कृपया ध्यान दे 12479 सूर्यनगरी एक्सप्रेस जोधपुर से.... सूरत, अहमदाबाद के रास्ते.... बांद्रा टर्मिनस को जाने वाली.... कुछ ही समय में प्लेटफार्म नंबर 1 से रवाना होने वाली हैं. जोधपुर रेलवे स्टेशन पर कंप्यूटराइज्ड फीमेल वोईस ने अलाउंस किया.

एक खूबसूरत कपल एक दुसरे का हाथ पकडे प्लेटफार्म पर मोहब्बत की सैर कर रहा था.
हटिये, हटिये, साइड दीजिये पीछे से 10-12 सूटकेस, बैगो से लदी लारी लिए आ रहे कुली ने आवाज दी.
एक दुसरे का हाथ छोड़ दोनों अलग हुए और लारी तेजी से उनके बीच से निकलती आगे बढ़ने लगी, उसके पीछे एक मोटी तगड़ी औरत और उसकी 3 मोटी बेटियां लारी के पीछे-पीछें भाग रही थी.
खाते-पीते घर की लगती हैं सब सामन से लदी लारी और दौड़ती मोटी फैमिली को देख प्लेटफार्म पर खड़े एक सज्जन ने चुटकी ली.
पानी बोटल, ठंडी पानी बोटल, सिर्फ 10 रूपये, 10 रूपये ट्रेन की खिड़की में झांकते हुए एक फटे-पुराने कपडे पहने लड़का धीरे-धीरे आगे बढ़ रहा था.
कुड़ियों का नशा प्यारे नशा सबसे नशीला हैं.... जिसे देखू वो यहाँ हुस्न की बारिश में गीला हैं.... भीड़, रेलवे अलाउंसर, ट्रेन-इंजन, खाने-पीने की सामग्री बेचने वालो के शोर-शराबे के बीच भी इस फ़िल्मी गाने के बोल लोगो के कानो तक कभी धीरे तो कभी तेज़ पहुँच रहे थे.
भीड़ को चीरते हुए एक लड़का, नाम अप्पू, उम्र 14 साल, आँखों में चमक थी लेकिन मटमैले चेहरे का गहरा रंग