based on true incidents ....
                                         
                                         विकास बस के इंतज़ार में बस स्टैंड पर खड़ा था| वो शहर जा रहा था जहाँ वह MCA की पढाई कर रहा था| दो बड़े बैग एक कंधे पे लदा हुआ, दूसरा सड़क के एक किनारे ज़मीन पर| उसके माता-पिता बगल में खड़े थे| उसकी माँ ने एक पुरानी साड़ी पहन रखी थी, सिर में सफ़ेद बाल, चेहरे पे हल्की-हल्की झुर्रिया, वहीँ दुसरे तरफ उसके पिता मैला सा सफ़ेद कमीज़-पायजामा पहने, खड़े-खड़े अपने हाथ में तम्बाकू में चुना मिला रहे थे| उसके माता-पिता के पहनावे को देखकर यह अंदाज़ा लगाना काफी आसान था की परिवार की हालात सामान्य से भी गयी गुजरी थी| उसके पिता की एक चाय की थडी थी, वही दुसरी तरफ उसकी माँ २-३ महाजन के घर पर काम करने जाया करती थी|

4 दिन बाद विकास के MCA 5th semester के इम्तिहान थे|

बेटा, चार इम्तिहान तो निकले गये बस अब यह आखिरी बचा हैं, इसमें कुछ गड़बड़ मत कर लेना विकास की माँ विकास के बालो में हाथ फेरते हुए बोली|
माँ आप क्यूँ चिंता कर रही हो मुझपे भरोसा रखो ना
तेरी पढ़ाई के लिए अपना घर गिरवी रख दिया, अगर तू कुछ ना बना तो....
आगे के शब्द उसकी माँ की गीली आँखों ने बयां कर दिए थे|
अरे आप खामखाँ इतने परेशान हो रहे हो दो महीने बाद बहुत बड़ी बड़ी कंपनियां आ रही हैं मेरी कॉलेज में फिर देखना आपका बेटा कैसे आपके सारे क़र्ज़ चुकता करता हैं|माँ के आंसू पोंछते हुए उसने उनका हौसला बढाया|
तभी बस के तेज़ हॉर्न से वार्तालाप विराम लेता हैं| विकास और उसकी माँ बेचैनी भरी निगाहों से एक दुसरे की तरफ देखने लगे, लेकिन उसके पिता पहले की तरफ अब भी सामान्य ही थे| बस आकर उनके सामने रुकी| विकास माँ-पिता के चरण स्पर्श कर बस में चढ़ा| अगले ही पल कंडेक्टर की सीटी पर बस रवाना होने लगी| उसकी माँ अपने साड़ी के पल्लू से आंसू पोंछते हुए जाती हुयी बस को देख रही थी|
विकास, अमित के नाम एक लड़के साथ रहता था जो की एक छात्र नेता था|
कॉलेज में नोटिस पढ़ाअमित सिगरेट जलाते हुए विकास से पूछा|
नही तो, कैसा नोटिस
2 महीने बाद एक के बाद एक 13 छोटी-बड़ी कंपनिया कैंपस-इंटरव्यू के लिए आ रही हैं, पर कमीनो ने एक शर्त रखी हैं
कैसी शर्त?विकास तनिक बोल उठा|
5 सेमेस्टर तक आप आल-क्लियर होने चाहिए तभी इंटरव्यू में बैंठ सकते हो, मैं तो साला पहली बॉल में रन-आउट हो गया, 4th सेमेस्टर में 2 बैक हैं|धुंए का एक बड़ा सा गुब्बार हवा में छोड़ते हुए बोला|
साले, क्यूँ टेंशन लेता हैं अभी नही तो फिर कभी, ज़िन्दगी थोड़े ना ख़त्म हो रही हैंविकास, अमित के पीठ पे जोर से मारते हुए उसका हौंसला अफजाई करता हैं|
वक़्त की रफ़्तार में पता ही नही चला कब एग्जाम आये और चले भी गये| आज एग्जाम खत्म हुए तकरीबन एक महीना बीत चुका था| विकास घर के काम में माँ की मदद कर रहा था| तभी विकास का मोबाइल बजता हैं, सुधीर का कॉल था| सुधीर काफी धीरे-धीरे बोल रहा था|
साले इतना धीरे क्यूँ बोल रहा हैं?
विकास, अपना रिजल्ट आ गया हैं, तो घर पे किसी को पता नही चले इसलिए, पहले मैं देख लु फिर घर पे बताऊंगा, अगर पास हो गया तो, वरना रिजल्ट एक महीना लेट
विकास जोर-जोर से हंसने लगा|
तू जल्दी से देख कर बता
मेरे नेट का रिचार्ज खत्म हो गया हैं, रुक मैं अमित में पूछता हूँ|
विकास अमित को फ़ोन लगाता हैं| एक लम्बे अंतराल तक सिर्फ अमित बोल रहा था और विकास सुन रहा था और अचानक विकास के हाथ से फ़ोन छुट गया| फर्श पर गिरते ही बैटरी मोबाइल से अलग हो गयी| अमित ने कहा....
यूनिवर्सिटी ने बैंड बजा दी यार, वायरलेस कम्युनिकेशन में ठोक दी उसने, 60 में से 50 को बैक, यार तू भी हैं उसमें और ऑब्जेक्ट-ओरिएंटेड सॉफ्टवेर इंजीनियरिंग में उसने मुझे 80 में से 57 दे दिए और तेरे सिर्फ 17 आये, पता नही कैसे कॉपिया चेक की सालो ने
मोबाइल के गिरने की आवाज सुनते ही माँ रसोई से बाहर आ गयी| विकास एकदम बेसुध सा खड़ा था| एक पल के लिए ऐसा लगा रहा था मानो जैसे उसकी सांस ही नहीं चल रही हो|
क्या हुआ बेटा?माँ ने विकास के कंधे को तेजी से हिलाते हुए कहा|
विकास क्षणिक सा जगते हुए माँ को चकित भरी निगाहों से देखने लगा|
तू ठीक तो हैं, किसका फ़ोन था
माँ, वो....अमित का....बोला रिजल्ट....आ गया....मैं....मैं....
क्या मै, क्या रिजल्ट रहा
हल्के-हल्के परेशानी के भाव उसकी माँ के चेहरे पे उपस्तिथि दर्ज कराने लगे थे|
मैं दो विषय में फेल हो गया
यह आखिरी शब्द थे विकास के वापस शहर लौटने से पहले| उस दिन माँ ने जो खाना बनाना बीच में छोड़ा था, बस वो वही छुटा रह गया| माँ और बेटे दोनों एक कौन में बैंठे बैंठे बस आंसू बहा रहे थे| शाम को जब पिताजी घर लौटे तो उन्हें पूरी बात चलते ही वो विकास पर बरस गये| यहाँ तक की उन्होंने विकास को दो चांटे भी लगाए, इसलिए नहीं की वो फेल गया, बल्कि इसलिए की उनका अपना घर वापस हासिल करने का आखिरी मौका हाथ से निकल गया था और वो बेघर होने वाले थे| विकास को दोषी मानने वाले उसके माता-पिता असलियत से बहुत कौसो दूर थे|
यूनिवर्सिटी के बाहर विकास के सभी सहपाठी अमित के नेतृत्व में प्रदर्शन कर रहे थे| सभी के हाथ में बैनर और बैनर पे बड़े बड़े अक्षरों में लिखा वी वांट ट्रूथ| विकास सिर्फ एक मूर्ति की तरह अमित के बगल में खड़ा था| उसके दिलो-दिमाग में तो उसकी माँ का रोता हुआ चेहरा, पिता के चांटे और गिरवी पड़ा मकान घूम रहे थे| छात्र धुप में भूखे-प्यासे खड़े थे, लेकिन यूनिवर्सिटी का कोई भी प्रोफेसर, चांसलर, वाईस-चांसलर, क्लर्क उनकी सुध लेने नही आया|

अंदर स्टाफ-रूम का माहौल कुछ ऐसा था| चार प्रोफेसर शर्मा, दुबे, गायकवाड और खान चाय की चुस्कियो में मग्न बैठे थे|
हाँ तो, दुबेजी क्या कहना चाहोंगे अपनी सफाई में? प्रोफेसर शर्मा मुस्कुराते हुए प्रोफेसर दुबे से बोले|
कैसी सफाई?
इतने भी भोले मत बनिए, बाहर जो यह छात्रो की भीड़ खड़ी हैं इसके जिम्मेदार आप ही हैं, वायरलेस की कॉपिया आपने ही चेक की हैं|

दुबेजी ने चाय का प्याला होंठो से हटाकर टेबल पर रखा और और बोलना शुरू किया....
अब शर्माजी आपसे अब क्या छुपाना, दरअसल उस रात हम काफी पीये हुए थे, देर रात घर लौटे, तो वो ही पत्नी की रोज की बकवास, कीच-कीच, अब कौन रोज-रोज सुनेगा, दिए दो कान के नीचे, पत्नी हो गयी नाराज, फिर सोचा मना लेते हैं मैडम को, रात काफी हो गयी थी तो हमदर्दी भी तो जतानी थी ना, क्यूँ गायकवाड सही जा रहा हूँ ना....|
प्रोफेसर गायकवाड हाँ में सिर हिलाने लगे| उन्हें यूनिवर्सिटी में पोस्टिंग किए डेढ़ साल ही हुआ था और यहाँ आने से पहले उनके स्वर्गीय पिताजी ने उन्हे गुरु मंत्र दिया था की अगर ज़िन्दगी में आगे बढ़ना हैं तो सीनियर की हाँ में हाँ मिलाओ|
दुबेजी फिर बोलना शुरू होते हैं....
....अब हम मर्द तो होते हैं भूखे भेड़िये, हर जगह तो मुँह नही मार सकते ना, पत्नी पत्नी होती हैं, लेकिन मानी ना उस रात, हमदर्दी अधूरी रह गयी, रोज आदत भी ना हमारी रात को जल्दी सोने की 2-3 बजना तो मामूली सी बात हैं, क्यूँ गायकवाड सही कह रहा हूँ ना....
प्रोफेसर गायकवाड हाँ में सिर हिलाया|
....एक नशा उतरा नहीं और दूसरा नशा चढ़ा नही, अब बैठे-बैठे करे क्या, सोचा चलो कॉपिया चेक करते हैं, पता नही, नशे में क्या चेक किया और क्या नहीं, हो गये सब फेल, अब हमारी पर्सनल प्रॉब्लम यह बच्चे थोड़े ना समझेंगे, हमे भी बच्चा चाहिए, क्यूँ गायकवाड सही कह रहा हूँ ना....
प्रोफेसर गायकवाड ने फिर से हाँ में सिर हिलाया|
हम आपकी परेशानी समझ सकते हैं, मेरे साथ भी एक-दो बार ऐसा हुआ हैं प्रोफेसर खान, दुबे के कंधे पे हाथ रखते हुए दिलासा देते हैं| सब हंसने लगते हैं|
चलो दुबे साहब हम आपकी परेशानी समझ सकते हैं, फिर ये ऑब्जेक्ट ओरिएंटेड सॉफ्टवेर इंजीनियरिंग सब्जेक्ट में क्या हुआ? प्रोफेसर शर्मा सवाल पूछते हैं|
मैं बताता हूँ हुआ क्या?एग्जामिनेशन कण्ट्रोल रूम के क्लर्क रमन चौधरी स्टाफ-रूम में प्रवेश करते हुए बताना शुरू करते हैं|
सब जिज्ञासा भरी निगाही से क्लर्क की तरफ देखते हैं|
वो उस सब्जेक्ट की कॉपिया गुम हो गयी थी, यह बात सिर्फ मुझे और चांसलर साहब को पता हैं, अब नंबर तो देने पड़ेंगा ना और मैं कोई अंतर्यामी तो हूँ नहीं की फलाना रोल नंबर वाला होशियार हैं या ढपोरशंख हैं, बस हनुमानजी की नाम लेके चढ़ा दिए नंबर, जिसकी तकदीर में जितना था मिल गया उसे, और वैसे भी ज्यादा बच्चे फेल होंगे तो यूनिवर्सिटी को तो फायदा ही हैं, रेवोलुशन की फी, बैक-एग्जाम की फी, यूनिवर्सिटी को फायदा मतलब, हमे भी फायदा|
सभी प्रोफेसर ऐसे मुस्कुरा रहे थे जैसे बहुत बड़ा मैदान मार लिया हो|
आज छात्रो के प्रदर्शन का चौथा दिन था, लेकिन यूनिवर्सिटी के किसी भी मेम्बर ने छात्रो से बात नही की थी अब तक| आज प्रदर्शन थोडा उग्र हो रहा था, छात्र सिक्यूरिटी गार्ड से हाथापाई पर उतर आये थे  यूनिवर्सिटी में प्रवेश करने के लिए| लेकिन विकास एक छोर पे खड़ा गुमशुम सा मोबाइल में कुछ टाइप कर रहा था| वो थोडा सा बीमार दिख रहा था, शायद तनाव उस पर हावी हो रहा था|
कुछ ही देर में पुलिस की दो गाडिया तेज गति से आकर यूनिवर्सिटी के गेट के पास रूकती हैं| 14-15 पुलिसमैन गाड़ी से उतरते हैं और लाठियों के साथ छात्रो को यूनिवर्सिटी से दूर खदेड़ने लगे| छात्रों की भीड़ तीतर-बीतर होने लगी, सब डरे, सहमे, हताश, अपनी जान बचाते इधर उधर भाग रहे थे|
तभी अचानक अमित को विकास को ख्याल आया| अमित विकास को इधर उधर भीड़ में ढूंढने लगा पर वो कहीं नही मिला| पूरा मामला शांत हो चुका था| कुछ छात्र अपने हॉस्टल में मायूस बैठे थे, तो कुछ चाय की थडियो पे यूनिवर्सिटी पर बातूनी गुस्सा जाहिर कर रहे थे| अमित थका-हारा अपने रूम पर लौटा और....
कुर्सी फर्श पर टेढ़ी पड़ी थी, विकास पंखे से लटका हुआ था, उसके मुंह से झाग निकल रहे थे, अमित भागकर उसके पैरो को ऊपर की तरफ उठाकर उसे फंदा से निकालने की नाकाम कोशिश कर रहा था, अमित जोर-जोर से चिल्लाना चाहता था मदद के लिए, पर उसके मुंह से आवाज ही नही निकल पा रही थी....पास की टेबल पर पड़े विकास का मोबाइल वाएब्रेट करने लगा| विकास की माँ का फ़ोन था, लेकिन फ़ोन उठाने वाले ने तो खुद को ही उस दुनिया से उठा दिया था| थोड़ी देर के बाद फ़ोन कट गया| मोबाइल का write message फोल्डर ओपन था, उसमें एक मेसेज टाइप किया हुआ था....ऍम सॉरी माँ-पिताजी, आई क्विट....


यह कहानी मैं उन स्टूडेंट्स को समर्पित करता हूँ जिन्होंने अपनी ज़िन्दगी ख़त्म कर दी, कुछ गन्दी नाली की कीड़ो की लापरवाही की वजह से.... R. I. P.