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सिगरेट


“ज़िन्दगी साली सिगरेट की तरह होती हैं.... बस एक बार सिर्फ सुलगने की देर हैं.... दो चीजों के सिवाय कुछ नहीं मिलता.... एक ज़िन्दगी का गला घोंट देने वाला धुआं.... तो दूसरा अतीत की काली स्मृतियों की राख, जो वक़्त के झोंको के साथ हवा में बिखरती दूर तो चली जाती हैं पर मिटती नहीं”-अखबार के आखिरी पन्ने पर किसी अज्ञात का छपा उपदेश पढ़ते ही वो लड़का मुस्कुराया.

              इंसान सिर्फ दो परिस्तिथियों में ही मुस्कुराता हैं.... एक, जब उसे कुछ समझ में नहीं आता.... और दूसरा, उसे स्वयं की सोच की सीमा से ज्यादा समझ में आने लगता हैं, तब वो मुस्कुराता हैं कि मैं इतने अच्छे से कैसे समझने लग गया? वो लड़का पहले वाला इंसान था, आखिर उसकी उम्र ही क्या थी?....सिर्फ 14 साल. फिर वो कैसे समझ पाता? लेकिन किसी महापुरुष ने कहा हैं कि किसी एक दिन ज़िन्दगी सब सिखा देंगी. वो दिन बहुत जल्द–ही उसकी ज़िन्दगी में दस्तक देने वाला था.


              बस स्टॉप की तरफ आती सिटी बस का हॉर्न बजते ही अंकल ने अखबार समेटा. अखबार के पीछे उस लड़के को खड़ा देख वो चौंके, लड़के ने अपराध-बोध भाव से अंकल के चेहरे पे नजर डाली और चल पड़ा अपने घर की तरफ. उसका नाम था आशीष.... आशीष खन्ना. पतला-दुबला सा, घुंघराले बाल, गोल-चकोर आँखें, हल्की-सी टेढ़ी नाक व टेढ़े-मेढ़े दांत. दोपहर करीब 3 बजे स्कूल यूनिफार्म पहने कंधे पे भारी बैग लांधे स्कूल से घर जा रहा था.

              वो बस स्टॉप से कुछ दुरी पर बने आर्मी के क्वार्टर में रहता था. उसके पिता आर्मी में मेजर थे व माँ हाउस वाइफ. जब वो 6 साल का था तब एक सड़क दुर्घटना में अनाथ हो गया. तब से वो अपने चाचा-चाची के साथ रह रहा था. चाचा बैंक में क्लर्क थे व चाची ब्यूटी-पार्लर चलाती थी. उनको अपने भतीजे से ख़ास तो क्या ज़रा-सा भी लगाव नहीं था. वो आशीष के दादाजी जो रिटायर्ड कर्नल थे, फिलहाल अमेरिका में अपने तीसरे बेटे के साथ रह रहे थे, उनके आदेश की अवहेलना नहीं कर सकते थे इसलिए आशीष को बोझ ही सही पर अपने पास रखना पड़ा.

              आशीष की ज़िन्दगी भी हैरी-पॉटर से काफी मिलती-जुलती थी. फर्क बस इतना था कि हैरी सीढियों के नीचे बने छोटे-से कमरे में रहता था, तो आशीष सीढ़ियों के पास हैरी के कमरे से थोड़े-से बड़े कमरे में रहता था. हैरी को उसके अंकल ने कभी स्कूल नहीं भेजा था, पर आशीष को यह सौगात उसके दादाजी के वजह से मिली थी जो उसकी ज़िन्दगी में डम्बल्डोर थे(हैरी पॉटर उपन्यास में हार्वर्ड जादुई स्कूल के प्रिंसिपल जिनको हैरी से खास लगाव था और वो हर वक़्त उसकी मदद व रक्षा किया करते थे). हैरी के चचेरे भाई डैडली की तरह उसका भी एक चचेरा भाई था....कौशिक. वो आशीष से तीन साल बड़ा व दो क्लास आगे दसवीं में पढता था. वो डैडली की तरह मोटा-बदसूरत नहीं था, एकदम फिट था, पर आशीष पर उसके अत्याचार डैडली की तरह ही थे. वो चुपके से अपना होम-वर्क करवाता, अपने जूते पोलिश करवाता था. चाचा-चाची भी उसे घर का कुछ न कुछ काम करवाते रहते थे, बदले में आशीष को अपमान, धिक्कार व गुस्से के सिवाय कुछ नहीं मिला. फिर भी वो खुश था, इसकी वजह यह थी कि उसने बचपन से अब तक हर रोज अपमान, धिक्कार व गुस्सा सहा था जो अब उसकी आदत में शुमार हो चुका था. फ़िल्मी गाने के बोल के हिसाब से कहे तो ‘लत लग गईं’.

              बचपन में एक दिन जब वो अपने पापा के साथ स्कूटर पर ट्रैफिक-सिग्नल पर रुका तो उसकी नजर एडवरटाइजमेंट बैनर पर पड़ी. एक बड़ी सी लड़की साडी पहने मुस्कुरा रही थी. आशीष भी उसे देख मुस्कुराया. लेकिन अगले दिन वो उसी ट्रैफिक सिग्नल पे रुका तो देखा कि लड़की की जगह कोई लड़का हाथ में मोबाइल लिए बैठा था. वो बैचैन हो गया कि लड़की कहाँ चली गई? और यह लड़का कहाँ से आया? उसने पापा से पूछा तो उन्होंने मुस्कुराते हुए उसे समझाया कि लड़की रात को चोरी हो गई, इसलिए लड़के को वहां पर बिठाया हैं. लेकिन जब कोई बैनर 3-4 दिन तक नहीं हटता तो वो अपने पापा से चोरी न होने की वजह पूछता और उनके पास मुस्कुराने के सिवाय और कोई जवाब नहीं होता.         यहीं से उसके भीतर एक कीड़ा उत्पन्न हुआ. हर रोज सड़क से गुजरते उसे एडवरटाइजमेंट बैनर देखने व पढने का चस्का लगा. वो उन्हें पढने में इतना मशगुल हो जाता कि घर देरी से पहुँचता, पहले चाची डांट लगाती, फिर चाचा. कई बार तो चाचा ने पिटाई भी की पर कीड़ा नहीं मरा.

              बैनर पढने के कीड़े के अलावा एक और कीड़ा भी था उसमें, सड़क पर कुछ ढूंढते हुए आगे बढ़ना. सडक के पास फूटपाथ पर दिन में बच्चे कंचे खेलते, तो रात में बड़े-बुड्ढ़े ताश. सप्ताह में 3-4 दिन कुछ न कुछ मिलता रहता था. कभी कंचे, कभी ताश के पत्ते, कभी इश्तार के कागज़. इस कीड़े की मुख्य वजह भी उसके पापा ही थे. वो हर रोज शाम को उसे अपने साथ अजीज मित्र की कबाड़ी की दूकान पे ले जाया करते थे. घंटो गप्पे चलते और आशीष पुराने अखबार, कॉपी, किताबे, इश्तहार के साथ खेला करता और कभी कभी अपने साथ घर भी ले आता था.


              एक दिन उसे इश्तहार का कागज़ मिला जिस पर लिखा था “शीघ्रपतन के उत्तम इलाज के लिए एक बार अवश्य पधारे”. वो उसे घर ले आया. उस रात ने चाचा ने बड़ी बेरहमी से उसकी पिटाई की. तीन दिन उसे बुखार रहा, फिर भी कीड़ा नहीं मरा. उसके पास 78 कंचे इकट्ठे हो चुके थे. वो ताश के 43 पत्ते इक्कठे कर चूका था और उसका लक्ष्य था 52 पत्तो की पूरी ताश. तरह-तरह के न जाने कितने इश्तहारो का उसके पास अच्छा-ख़ासा संग्रह था. जिस दिन उसे कुछ नहीं मिलता, उस दिन वो एक हारे हुए शिकारी की तरह मायूस घर लौटता.             

              एक दिन भी जब वो घर लौट रहा था तब भी उसकी नजरें जमीन पर ही टिकी थी. अचानक उसकी नजर एक छोटे आयताकार कागज़ के बने डिब्बे पर पड़ी. उस पर पतले-से पोलीथिन का कवर चढ़ा था, जिस पर गिरती सूर्य की तीखी किरणें आशीष की नजरों को अपनी ओर आकर्षित कर रही थी. उसने करीब जाकर उस डिब्बे को उठाया, उस पर ‘Marlboro’  नाम अंकित था. वो एक सिगरेट का डिब्बा था, जो पूरा भरा सील पैक था.

            सिगरेट का डिब्बा जान उसने उसे सड़क पर फेंक दिया. कुछ देर तक वहीँ खड़ा उसे निहारता रहा. ‘Marlboro’  ब्रांड का पैकेट देख उसे बचपन के वो दिन याद आये, जब वो अपने पापा के साथ कबाड़ी-अंकल की दूकान पे जाया करता था और कबाड़ी अंकल हर रोज ऐसा ही एक पैकेट में से सिगरेट निकालकर पिया करते थे. उसने कई बार उस पैकेट को अपने हाथ में लेकर देखने की कोशिश की, लेकिन फटाक से अंकल उसके हाथ से छीन मुस्कुराते हुए कहते कि “यह बच्चों के काम की चीज़ नहीं हैं” और हर रोज उसको करीब से निहारने की जिज्ञासा मन के एक कोने में दबी रह जाती थी. आज भीतर बसा कीड़ा आशीष को आदेश दे रहा था कि आज अपनी जिज्ञासा पूरी कर ले. आज तो वो कबाड़ी अंकल भी मौजूद नहीं थे जो उसके हाथ से छीन सके. उसके भीतर बसा कीड़ा उछल-कूद मचाना शुरू कर चूका था. आखिरकार वो उस कीड़े के आदेश की अवहेलना नहीं कर सका. दायें-बायें निगाहें फेंक उसे तपाक से उठाया, अपने नेकर की जेब में रख तेज कदमों से चल पड़ा घर की तरफ.

            लोहे की फाटक खोल प्रवेश करते ही उसने अपनी दायीं तरफ छोटे-से बगीचे में कौशिक को झूले पर झूलता पाया. आशीष को देखते ही कौशिक हर बार की तरह उट-पटांग शक्लें बना उसे चिढाने लगा. आशीष उसे पूर्ण नजरंदाज करता तेज कदमों से घर के भीतर घुसा.

            घर पर उसके व कौशिक के सिवाय कोई न था. उसने ड्राइंग रूम में सोफे पर अपना बैग फेंक तेजी से सीढियां चढ़ छत पर पहुंचा. पानी की बड़ी टंकी के सिरहाने छाया में जा बैठा. जेब से सिगरेट का डिब्बा निकाल उसे अपनी उंगुलियों के बीच फिराता काफी देर निहारता रहा. उसने स्वयं को कई सवालों के बीच घिरा पाया. उसकी नन्ही ऑंखें असमंजस में और नन्ही हो चुकी थी. मैं अब इस डिब्बे का क्या करूँगा? चाचा-चाची ने देख लिया तो? कितनी बुरी तरह मेरी पिटाई होंगी? मैंने इस डिब्बे को आखिर उठाया ही क्यूँ? मैंने जब उसे फेंका था तभी वहां से चल लेना था मुझे? काफी देर तक वो शून्य की स्तिथि में सोचता रहा. फिर सिगरेट के डिब्बे को फर्श पर रख अनायास ही उठा. सीढियां उतरा और तक़रीबन 15 मिनट बाद वापस लौटा तो उसके हाथ में एक डिजिटल कैमरा था.

            वो कैमरा उसके माता-पिता की आखिरी निशानी थी. जिस दिन चाचा-चाची की बेवजह डांट पड़ती, उस दिन वो उसमें अपने माता-पिता के फोटो देख अपने अनाथ गम को कम करने की कोशिश करता. दुबारा टंकी का सहारा लिए पैर फैला कर बैठा. कैमरे को बगल में रख सिगरेट के डिब्बे की सील खोल एक सिगरेट निकाली. काफी देर तक उसे अपनी उंगुलियों के बीच फिरा उसे निहारता रहा. ठीक वैसे ही जैसे कबाड़ी अंकल बातों में मशगुल उसे सुलगाने से पहले उंगुलियों के बीच फिराते रहते थे. फिर उस सिगरेट को अपने अंगूठे से पहली-दूसरी उंगुली के बीच फंसा होंठो से लगाया. मुंह में एक गहरी स्वांस भीतर खिंची, मानो एक सुलगती सिगरेट का कश ले रहा हो. फिर सिगरेट को होंठो से हटा आसमान की तरफ देख होंठो को एक-दुसरे से थोडा-सा अलग कर हवा बाहर फेंकी. ऐसा करते वक्त जेहन में बार-बार कबाड़ी अंकल की दूकान के स्मरण ताजा हो रहे थे, साथ ही बीड़ी-सिगरेट पीते वो लोग जिन्हें आशीष स्कूल से आते जाते वक्त बड़े घोर से देखा करता था.

           कुछ देर तक हवा के कश ले उसने कैमरा ऑन किया. उंगुली में पकड़ी सिगरेट, सिगरेट के डिब्बे की कुछ फोटो क्लिक की. फिर जेब से माचिस निकाल एक सिगरेट सुलगाई और सुलगती सिगरेट की भिन्न-भिन्न एंगल से फोटो क्लिक की. ऐसा करते-करते तीन सिगरेट पूरी तरह जल के राख बन चुकी थी और वो 30-35 फोटो क्लिक कर चूका था. चौथी सिगरेट सुलगा कर उसे डिब्बे पर रखा और वहीँ लेट गया. लेटकर उसे देखते-देखते न जाने कब उसकी आँख लग गई.

           चारों तरफ बड़े-बड़े ज्वालामुखी जिनमें से गर्म लावा निकल रहा था. चारो तरफ माहौल काफी गर्म था. एक बड़ी-लम्बी सिगरेट हवा में तेज रफ़्तार से उडती आगे बढ़ रही थी. आशीष उसको कसकर पकड़ बैठा था. भीषण गर्मी की वजह से वो पसीने में पूरा तर हो चूका था. तभी कहीं से गर्म लावा की हल्की-सी चिंगारी हवा में उड़ते आ सिगरेट के आगे के सीरे को सुलगा गई. सिगरेट को सुलगते देख आशीष के हाथ-पाँव फूलने लगे. सिगरेट तेज रफ़्तार से आगे बढ़ रही थी और साथ ही सुलगते हुए राख में तब्दील हो रही थी. सुलगते-सुलगते आशीष की तरफ बढ़ रही थी. आशीष धीरे-धीरे पीछे खिसक रहा था. नीचे चारो तरफ लावा ही लावा देख थर-थर कांप भी रहा था. धुंए के गुब्बार से सामने कुछ भी साफ़ नहीं दिखाई दे रहा था. हवा में तेज रफ़्तार से भागती सिगरेट डगमगाने लगी. आखिरकार वो गिर गया. वो चिल्लाता हुआ तेजी से नीचे बहते लावा की तरफ गिर रहा था. लावा के एकदम करीब पहुँच चूका था. वो भयभीत-सा और तेजी से चिल्ला रहा था. वो लावा में गिरने ही वाला था कि चटाक की आवाज के साथ घबराता हुआ जगा. आँखें मसलते हुए उठ बैठा. आँखें अधखुली थी. उसने अपने बायें गाल पर दर्द महसूस किया. गाल पर हाथ रखते ही उसकी आँखें पूरी खुली और चौंकते हुए पीछे खिसका.    
            

             धुप ने अलविदा कह दिया था. चाचा उसके सामने पैरो के बल बैठे थे. छोटे-छोटे बाल, आँखों में शोले, लाल-चमकता चेहरा, मूंछे, कद 6 फीट, आशीष की आँखों में आँखें डाल गुस्से में घुर रहे थे. बगल में गाउन पहने चाची आक्रोशित नाक पर हाथ रखे खड़ी थी. चारो तरफ सिगरेट की गंध अभी भी मौजूद थी. उनके पास कौशिक खड़ा था. कुछ देर पहले जो चटाक की आवाज सुनाई दी थी वो आशीष के गाल पर चाचा का तमाचा था. वो उन सबको सहमी निगाहों से देख रहा था. उसका गला सुख रहा था. उसकी नजर फर्श पर सिगरेट के डिब्बे पर पड़ी, जिसकी चार सिगरेट राख बनी इधर-उधर उडती-बिखरी पड़ी थी. अधखुली माचिस की डिबिया व कैमरा अपनी जगह पर यथावत पडे थे. उसे महसूस होने लगा था कि अगले चंद लम्हों में उसके साथ कितना बुरा बर्ताव होने वाला हैं. कुछ सवाल-जवाब शुरू हो उससे पहले एक और चांटे ने आशीष के भीतर ज्वालामुखी को हिला डाला और आँसू रूपी लावा छलक पड़ा.

“हरामजादे, तुने सिगरेट पीना शुरू कर दिया”-चाचा चिल्लाएं. बिना सोचे समझे उसने रूहांसी शक्ल के साथ इंकार में सिर हिलाया. आशीष जोर-जोर से सिसकियाँ भरने लगा.

“तो यह सब क्या मैंने किया हैं?”-चाचा ने बाएँ हाथ से सिगरेट का डिब्बा उठाया और दाएं हाथ से आशीष का कान मरोड़ते हुए बोले. दर्द के मारे आशीष कराह रहा था.

“बोल, किसने सिखाया तुझे सिगरेट पीना?”-कान को रिहा कर बहुत-से चांटे आशीष के गाल, सिर, गर्दन पर बरस पड़े. वो चिल्ला-चिल्लाकर रोना चाहता था पर उसके मुंह से सिसकियों के सिवाय कोई और आवाज न निकल पा रही थी.

“मैंने सिगरेट नहीं पी”-आशीष बड़ी मुश्किल से लफ्ज़ निकाल पाया.

“इसकी इन हरकतों की वजह से हमारे बेटे पर गलत असर पड़ेंगा”-चाची ने आगे बढ़ चमाट मारने का मौका न गंवाया. सिसकियाँ तेज हो रही थी. गाल लाल हो चुके थे.

“नालायक तेरी इतनी हिम्मत कि हमारी गैर-मौजूदगी में गलत काम करने शुरू कर दिए, आज तेरी सारी हेकड़ी बाहर निकालता हूँ”-चाचा ने उसके कमीज़ का कॉलर पकड़ सीढियों पे घसीटते हुए नीचे लाकर फर्श पर पटका. चाची व कौशिक भी नीचे आये. कौशिक के हाथ में कैमरा था. वो उसे ऑन करने की कोशिश कर रहा था लेकिन बैटरी लॉ की वजह से ऑन नहीं हो पा रहा था. सामने दीवार पर घडी में 6 बज रहे थे.

“चाचा मैंने सिगरेट नहीं पी....सच्ची....मेरा विश्वास करो”

“शालिनी दरवाजें-खिड़कियाँ बंदकर पर्दा लगा दो, आज मैं उसकी चमड़ी उदेड दूंगा”-इतना कहते ही चाची ने दरवाजे-खिड़कियाँ बंदकर पर्दे लगाए और चाचा ने अपने पेंट में से बेल्ट निकाली.

आशीष ने थूक निगला. उसकी सिसकियाँ रुक गई. आँसू भी जहाँ थे वहीँ सुख गए. हाथ अनायास ही विनती में चाचा के सामने जुड़ गए. भयभीत नजरें बेल्ट के किसी बिंदु पर आकर रुक गई.

उसकी दरख्वास्त खाली गई. एक लम्बी चीत्कार.... शरीर की नसों में रक्त अपना रास्ता बदलने लगा.... धडकने कभी तेज.... तो कभी रूकती.... फिर उल्टे पाँव लौटती.... फिर तेजी से धडकने लगती.... बिंदु  ओझल होने लगा था.... आँखें धीरे-धीरे बंद होने लगी....

....फिर एक और चीत्कार.... उसके लुप्त होते ही आँखें ने भी स्वयं को समेटना बेहतर समझा.... होंठो को भींचते-भींचते फर्श पर वो स्वयं के आगोश में ही सिमट गया....

जब आँखें खुली तो उसने खुद को एक अंधेरे कमरे में अकेला पाया. वो घर का स्टोर रूम था. चारो तरफ कुछ भी ठीक से नजर नहीं आ रहा था. स्टोर-रूम में रोशनदार भी नहीं था. कीड़े-मकोडों की अजीब तरह की धीरे-धीरे आवाजे आ रही थी. डर के मारे उसके जेहन में कंपकंपी छुटी. उसे अंधेरे से बहुत डर लगता था. उसकी पीठ व गाल दर्द के मारे जल रहे थे. उससे खड़ा ही नहीं हुआ जा रहा था. तभी उसने अपने हाथ पर किसी को चढ़ते पाया. उसने उसे छुआ तो उसे गिला सा महसूस हुआ. वो एक छिपकली थी. उसने फटाक से उसे अपने से दूर कर चिल्लाया. धडकने उल्टे पाँव उस छोर तक पहुँच चुकी थी जिस छोर के बाद धडकनों की जरुरत नहीं पड़ती. वो दुबारा बेहोश हो गया. घड़ी के 12 घंटे बजने से प्रतीत हुआ की रात की 12 बज चुकी थी और साथ ही आशीष की भी.

कुछ घंटो के बाद उसे दुबारा होश आया तब भी उसने स्वयं को वहीँ पाया. घडी के घंटे बजते ही ही वो डरा. उसकी साँसे पहले के मुकाबले अब काफी तेजी से चल रही थी. सुबह की 5 बज चुकी थी. वो बड़ा मुश्किल से खड़ा हो पाया. दर्द के मारे उसके मुंह से चीख निकली. उसने दरवाजा खटकाया. अपने चाचा-चाची को आवाज दी की प्लीज मुझे यहाँ से बाहर निकालो. उसने कौशिक को भी आवाज दी. पर कोई उसकी सुध लेने नहीं आया. वो उस अंधेरे से स्टोर-रूम में भयभीत-सा, भूखा, छिपकलियों से लड़ता, चिल्लाता, रोता पुरे चार दिन रहा. इसी बीच उसके डम्बल्डोर का भी फोन आया था लेकिन चाचा ने कह दिया कि आशीष स्कूल के बच्चो के साथ पिकनिक पर गया हैं. उन चार दिनों में उसकी हड्डियाँ पहले से ज्यादा बाहर दिखने लगी थी. तकरीबन 34 बार डर के मारे बेहोश हो चूका था.

34 वी बार बेहोशी के बाद जब उसकी आँख खुली तो उसने खुद को अपने कमरे में पलंग पर लाश की तरह पड़ा पाया. दो दिन तक उसने खुद को भूखा-प्यासा कमरे में बंद पलंग पर करवटों में व्यस्त रखा. चाचा-चाची ने परवाह की नहीं और उसमें उठने का सामर्थ्य था नहीं.

तीसरे दिन जब वो कमरे से बाहर निकला तो आशीष पूरा बदल चूका था. वो अब पहले जैसा आशीष नहीं, शून्य बन चूका था. हर पल चुप-चुप सा रहता. खाने को जो देते वो खा लेता. दुबारा नहीं मांगता. स्कूल से लौटते ही होमवर्क करता, फिर पुरे वक़्त पलंग पे एक लाश की तरह पड़ा रहता. कहीं बार पलंग पर पड़ा-पड़ा हाथ-पाँव हिलाते हुए मचलता था, रोता था, मानो कोई उसका गला घोंट रहा हो. लेकिन उसकी पुकार सुनने वाला कोई नहीं था. वो भूल चूका था कि कैमरे में मौजूद उसके माता-पिता उसका अनाथ गम दूर किया करते थे.

उसकी पीठ पे नीले निशान अभी भी मौजूद थे. उन निशान ने उसके भीतर एक जहर का काम किया, कीड़ों को मारने वाला जहर. वो बैनर पढना भूल चूका था. गर्दन नीचे किये स्कूल आता-जाता. कंचे फेंक दिए. ताश के ५२ पत्ते पुरे करने का लक्ष्य टॉयलेट में फ्लश हो चूका था. इश्तहार जला दिए थे.

लेकिन वो एक चीज़ नहीं भुला पाया तो वो था अँधेरा. उसके जेहन के भीतर अँधेरा समा चूका था. उसे हर रात अंधेरे में डूबे भयानक सपने आते. वो चीखते हुए जाग उठता, फिर उसे पूरी रात नींद नहीं आती. वो छोटी सी उम्र में ही अनिद्रा का शिकार हो चुका था. जिस वजह से उसका सिर बेरहमी से दर्द करता. वो बहुत बार बेहोश हो जाया करता था.

डम्बल्डोर के फ़ोन भी आते तो वो पहले जैसे हँसते-खिलखिलाते बातें नहीं करता, बस हाँ-ना करते फ़ोन रख देता. अपने साथ पिछलें दिनों जो कुछ घटित हुआ वो भी उसने उन्हें नहीं बताया, यह भी नहीं कि फिलहाल वो कैसी भयानक परिस्तिथि से गुजर रहा हैं.

बचपन से ही उसके जेहन में अपने दादाजी से एक सवाल था, जो वो कभी पूछ नहीं पाया. शायद उसे उसकी कभी जरुरत ही महसूस नहीं हुईं. आखिर एक दिन उसने पूछ ही लिया कि “आपने एक बार कहा था कि आपको अमेरिका जाना कतई पसंद नहीं था फिर आप वहां क्यूँ गये? और आप मुझसे इतना प्यार करते हैं तो मुझे अपने साथ अमेरिका क्यूँ नहीं ले गये?”. जो जवाब मिला, उस सच ने आशीष के मन को कचोटते उसमें एक नयी चेतना जगा दी.

डम्बल्डोर ने उसे बताया की “उसके माता-पिता की मौत के बाद उन्होंने फैसला किया कि तुम्हारी ज़िम्मेदारी बड़े बेटे को देंगे और वो स्वयं छोटे बेटे के साथ अमेरिका रहेंगे चाहे उन्हें पसंद हो या नहीं,  लेकिन अमेरिका पहुँच कर छोटे बेटे ने उन्हें अपने घर में रखने से इनकार कर दिया और बड़े बेटे ने शर्त रखी कि आशीष और उन में से किसी को एक को अपने पास रख सकते हैं और डम्बल्डोर आशिष की परवरिश के खातिर कभी भारत नहीं लौटे और वो पिछले 8 सालों से अमेरिका में वृद्धाआश्रम में रह रहे थे”.

आशीष ने उदासी भरे स्वर में पूछा “आपने ऐसा क्यूँ किया?”. डम्बल्डोर का जवाब था “ज़िन्दगी में कभी उम्मीद मत खोना, उम्मीद हैं तो सब हैं, लेकिन कभी-कभी वक़्त ऐसे नगमे पढाता हैं कि उम्मीद खत्म हो जाती और जिस दिन ज़िन्दगी से उम्मीद खत्म हो जाए उस दिन स्वयं को ज़िन्दगी के हवाले कर देना और मैं हमेशा के लिए अमेरिका वृद्धाआश्रम रुक गया.”

                      उम्मीद लफ्ज़ ने आशीष के अंदर एक बुझी हुईं चेतना जगा दी और उसने डम्बल्डोर से जिद की कि वो अब अकेला हॉस्टल में रहना चाहता हैं. वो खुद को भी ऐसे मोड़ पे पा रहा था जहाँ से अपने हालातों से लड़ उन्हें चित्त कर जीतने की उम्मीद बची नहीं थी, इसलिए उसने सोचा कि दादाजी की तरह खुद को ज़िन्दगी के हवाले करने के लिए अकेलेपन से बेहतर और कोई तरीका नहीं था.


                     कुछ दिनों के बाद दादाजी के आदेश पर चाचा ने उसे हॉस्टल में भर्ती करवा दिया. लेकिन अभी भी कुछ नहीं बदला था. पलंग पर लाश की तरह पड़े मचलना, सपने, अनिद्रा, सिर-दर्द, बेहोश होना, सब अभी भी जारी था. कई बार वो क्लास में बेहोश हो जाता था. स्कूल प्रशासन ने कई बार उसके चाचा को कॉल कर आशीष को अपने साथ घर ले जाने को कहा, लेकिन वो नहीं आये. बच्चे भी उससे डरने लगे थे कि वो किसी भयानक बिमारी से पीड़ित हैं, इसलिए कोई भी उसके पास बैठना व बात करना पसंद नहीं करता था और आशीष ने कभी उसकी जरुरत भी न समझी, वो तो बस अकेला गुमशुम अपने काम में मशगुल एक अलग ज़िन्दगी बसर कर रहा था. वो लड़ रहा था स्वयं के भीतर मौजूद रात के अंधेरों से, बिना उम्मीद के कि कभी सुबह होंगी और उजाला होंगा.

                    2 साल बीत गए. कोई उसकी सुध लेने नहीं आया. वो दसवीं कक्षा में आ चूका था. बड़ा और समझदार भी हो गया था. डम्बल्डोर ने दुनिया को अलविदा कह दिया था. चाचा ने रूपये भेजने बंद कर दिए. डम्बल्डोर के गुजरने के बाद उसकी स्कूल और हॉस्टल फीस कौन भर रहा था उसने कभी जानने की चेष्टा भी नहीं की. सबकुछ बदल गया था सिवाय एक चीज़ के.... अँधेरा अब भी जेहन में कायम था.

                    एक दिन वो सड़क से गुजर से रहा था तो चाय की थडी पर बैठे सिगरेट पी रहे उसके कुछ सहपाठीयों ने आवाज दी. आशीष उनके पास गया. दो साल बीतते-बीतते उसमें सबसे बड़ा बदलाव यह आया था कि जब कोई आगे से उससे बात करता तो वो कर लेता था वरना उसे किसी से कोई मतलब नहीं था. उन्होंने एक स्टूल आशीष की तरफ किया. आशीष उस पर बैठा. उन्होंने एक सुलगती सिगरेट उसकी तरफ बढाई. आशीष ने निसंकोच उसे लिया. उसने ज़िन्दगी में पहली बार सुलगती सिगरेट को होंठो से लगाया था. धुंए को अंदर खींचते वक़्त उसे वो छत वाला दृश्य याद आ रहा था, साथ ही वो अँधेरी रातें. कश लेते ही धुएं का गुब्बार हवा में छोड़ा. हर एक कश खींचने पर उसे एहसास होता कि जेहन में धुंए संग अँधेरा बढ़ रहा हैं, लेकिन जैसे ही वो धुएँ का गुब्बार हवा में छोड़ता, खुद को पहले से बेहतर महसूस करता, मानो धुएँ के गुब्बार उसके भीतर समाये हुए अंधेरे को अपने साथ कहीं दूर ले जा रहे हो.

                 उसने एक नजर धुंए के गुब्बार पर डाली, फिर एक नजर जमीन पर बिखरती राख पर. आशीष मुस्कुराया. वो दो सालों में पहली बार मुस्कुराया था और उसके होंठो से अनायास ही लफ्ज़ निकल पड़े....


“ज़िन्दगी साली सिगरेट की तरह होती हैं.... बस एक बार सिर्फ सुलगने की देर हैं.... दो चीजों के सिवाय कुछ नहीं मिलता.... एक ज़िन्दगी का गला घोंट देने वाला धुआं.... तो दूसरा अतीत की काली स्मृतियों की राख, जो वक़्त के झोंको के साथ हवा में बिखरती दूर तो चली जाती हैं पर मिटती नहीं”.

दी एस्कॉर्ट हार्ट -12- (एंड ऑफ़ रिवेंज)

पिछली कड़ी:- दी एस्कॉर्ट हार्ट -11- (रिटर्न ऑफ़ दी किंग)


                    डायने एस्कॉर्ट पहुँच चुकी थी. सिपाही उन पर तीर दाग रहे थे लेकिन उनको कुछ फर्क नहीं पड रहा था. डायनों की जान उनके जादुई बालों में कैद थी. अगर छोटा सा बाल का टुकड़ा भी टूट जाए तो वो जल के भस्म हो सकती थी. वे सैनिकों को आराम से मार रही थी. उनके लिए मुश्किल था पिशाचों को मात देना. वहां मौजूद पिशाच डायनों को कड़ी टक्कर दे रहे थे. कुछ डायने राज्य में प्रवेश कर चुकी थी. पिशाच उनका हर कदम पर रास्ता रोकने की कोशिश में थे. उनकी लड़ाई में टक्कर इतनी जबरदस्त होती कि घर की दीवारे टूट रही थी. डायने पिशाच पर अपना जादू इस्तेमाल कर रहे थे, वो उन पर चांदी की तरंगो का हमला कर रहे थे, लेकिन पिशाच अपनी रफ़्तार से उसे चकमा दे रहे थे, क्यूंकि अगर वे डायनों को कहीं भी काट खाते तो भी डायनों को कुछ फर्क नहीं पड़ने वाला था, इसलिए उनका निशाना डायनों के बालों को खाकर काट देना था. सुरंग में लोग काँप रहे थे बाहर लड़ाई की आवाज सुनकर. उनसे भी ज्यादा तो राजा क्रिस्टन काँप रहा था. नेफ्थन ने आकर खबर दी कि काफी सिपाही मारे जा चुके हैं, आप कब लड़ने जायेंगे. क्रिस्टन ने जवाब दिया कि पिशाचों को आने दो फिर. नेफ्थन ने अपनी म्यान में से तलवार खिंची और निकल पड़ा अपनी कुर्बानी देने के लिए. काफी सिपाही मारे जा चुके थे. 2-4 पिशाच ही मारे गए और उतनी ही डायने.

                    कुछ ही पल बाद वहां पर-परियां भी पहुँच गए. लड़ाई और खतरनाक होती

दी एस्कॉर्ट हार्ट -11- (रिटर्न ऑफ़ दी किंग)

पिछली कड़ी:- दी एस्कॉर्ट हार्ट -10- (ट्रुथ ऑफ़ इवान्स) 

डफलीन की हजारों डायने आसीन के नेतृत्व में निकल पड़ी थी एस्कॉर्ट की ओर. आसमान में परिंदों से भी चौगुनी रफ़्तार से आगे बढ़ रही थी. उनको पिशाचों के एस्कॉर्ट पहुँचने से पहले एस्कॉर्ट पर कब्ज़ा करना था.
दूसरी तरफ पर-परियां भी रवाना हो गई थी डफलीन की ओर. रोजलीन उस फ़ौज की सेनापति थी. उन्हें नहीं पता था कि डायने डफलीन में नहीं हैं, वो एस्कॉर्ट के लिए निकल गई हैं.
आसीन का उल्लू उड़ता हुआ उसके सामने आया. दोनों ने एक-दुसरे की आँखों में देख. वो यह सन्देश लेकर आया था कि “परियां योजना के मुताबिक़ डफलीन की ओर निकली हैं, इवान्स शायद अभी भी उसी जंगल में हैं, पर जंगल के बाहर बहुत-से भूत पहरा दे रहे हैं इसलिए मैं अंदर नहीं घुस पाया”.
“कब निकलने का सोचा हैं हमनें?, डायने डफलीन से निकल चुकी हैं और परियां परीलोक से”- एक पिशाच ने किमियन से कहा.

“मैं थोड़ी देर खेल देखना चाहती हूँ, उन डायनों को एस्कॉर्ट पर कब्ज़ा करने दो, ताकि राजा मारा जाए, तब तक वो परियां भी पहुँच जायेंगी, कुछ डायनों का काम वो तमाम कर देंगी और फिर आखिर में वैम्पर अपनी असली ताकत दिखा के सबको चारो खाने चित करेंगे और एस्कॉर्ट अपनी सल्तनत में होंगा”-किमियन ख़ुशी के मारे हँसने लगी.

दी एस्कॉर्ट हार्ट -10- (ट्रूथ ऑफ़ इवान्स)

पिछली कड़ी:- दी एस्कॉर्ट हार्ट -9- (दी रिवेंजेबल बैटल बिगिन्स)

“कैसे हो मेरे दोस्त?”-भूत ने सलाम करते हुए अभिवादन किया.
“जैसा तुम छोड़कर गए थे वैसा ही”-इवान्स ने ताना मारा और एक पेड़ के सिरहाने बैठ गया. वो  गुस्से में था.
“ओह्ह्ह्ह, तो मतलब कुछ भी नहीं बदला”
“नहीं बदला, इतना सब कुछ तो बदल चूका हैं, अब और क्या बाकी रह गया?”
“तुम तो वो ही इवान्स हो फिर कहाँ कुछ बदला?”-भूत सबकुछ जानते हुए भी उसे छेड़ रहा था. उसके चेहरे पे मुस्कराहट थी जिसे वो छुपाने की कोशिश कर रहा था, कहीं इवान्स उस पर भड़क ना जाए.
“हाँ, इवान्स तो वो ही हैं बस हालातों के साथ उसके अपने बदलते गए और आज वक़्त ऐसा आ गया कि....और मेरे अपनों के बनाए हालातों की सजा मैं भुगत रहा हूँ....”-इवान्स बोलते-बोलते रुक गया. वो वापस खड़ा हुआ.

दी एस्कॉर्ट हार्ट -9- (दी रिवेंजेबल बैटल बिगिन्स)

पिछली कड़ी:- दी एस्कॉर्ट हार्ट -8-(एक्सट्रीकेट टू रोजलीन)


“कौन हैं यह लड़की?”-एक डायन ने आसीन से पूछा.

“परी,  उसके पिता डामिन के राजा सोबरीन थे व उसकी माँ एक परी, जब सोबरीन कास्टरिका पर हमले के लिये जा रहा था तब अपनी मौत को करीब आते देख क्रिस्टन जंगल में छिपा था और फिर मैंने उसकी मदद की, मैंने सोबरीन को युद्ध में मार डाला ”-आसीन ने उदासी भरे स्वर में बोली और अपनी नजरें झुका दी. सभी डायनों के चेहरे का रंग उड़ गया. उनका गला मानो सुख चूका हो, वैसे वे खामोश रोजलीन को देख रही थी. रोजलीन गुस्सैल निगाहों से सबको देख रही थी.

“हमनें अपनी सबसे बड़ी दुश्मन की मदद की, इवान्स ने इतना बड़ा धोखा दिया”-एक डायन इवान्स पर चिल्लाई.

“बहुत-बहुत शुक्रिया मुझे छुड़ाने के लिए, लेकिन मैं अपने माता-पिता के हत्यारी को नहीं छोड़ सकती”-रोजलीन आवेश में बोलते आसीन की तरफ बढ़ने लगी. वहां मौजुद सभी डायने रोजलीन की तरफ बढ़ने लगी.

“रुको!”-इवान्स चिल्लाया. तभी रोजलीन का सिर चकराने लगा और जमीन पर बेहोश गिर गई. सब डायने रुक गई. इवान्स रोजलीन के करीब भागा. उसे उठाकर एक घर के भीतर ले गया. सभी डायनों ने एक साथ आसीन की तरफ देखा.

“मुझे माफ़ कर देना, लेकिन मुझे स्वयं को नहीं पता था कि इवान्स जिस लड़की से प्यार करता हैं, जिसे वो छुड़ाने की लिये मदद मांग रहा हैं, वो एक परी हैं”-आसीन ने हाथ जोड़ सबसे माफ़ी मांगी.

“तो फिर क्या सोचा तुमने आसीन?”-एक डायन बोली.

“परी को खत्म कर दो और जो बीच में आये उसे भी, चाहे वो इवान्स ही क्यूँ न हो”-इवान्स का नाम लेते ही आसीन की आँखों से आंसू टपकने लगे.

दी एस्कॉर्ट हार्ट -8- (एक्सट्रीकेट टू रोजलीन)

पिछली कड़ी:- दी एस्कॉर्ट हार्ट -7-(सन मीट्स मदर)


                     महल के मुख्य-द्वार के घोड़ागाड़ी आकर रुकी. उसमें से राजा क्रिस्टन व सेनापति नेफ्थन उतरे.

“कौन हैं तू?”-द्वारपाल ने बड़ी बदतमीजी से पूछा.

“किमियन को संदेशा भिजवा दो कि उनसे मिलने एस्कॉर्ट के राजा क्रिस्टन आये हैं”-नेफ्थन ने व्यवहारिक जवाब दिया.

“राजा कौन हैं तू या यह”-और जोर-जोर से हँसने लगा. नेफ्थन ने क्रिस्टन की तरफ इशारा किया.

“इसमें सन्देश भिजवाने की क्या जरूरत हैं खुद ही चलकर बोल दो की एस्कॉर्ट के राजा क्रिस्टन तुमसे मिलने आया हैं”-और दुबारा जोर-जोर से हंसने लगा.

                     महल के भीतर क्रिस्टन, नेफ्थन द्वारपाल के साथ पैदल गुजर रहे थे. हजारों एकड़ में फैले उसे महल के अंदर भी हजारों छोटे-बड़े महल बने थे. बहुत-से पिशाच भीड़ में इक्कट्ठे ठहाके लगाते जोर-जोर से हंस रहे थे. कोई शराब के नशे में डूबे थे. कोई ताश-जुए खेलने में व्यस्त थे. तो कोई खुल्लेआम सहवास कर रहे थे. क्रिस्टन व नेफ्थन ने शर्म के मारे अपनी नजरें झुका दी.

                      किमियन अपने कक्ष में बैठी क्रिस्टन के आने के इंतज़ार कर रही थी. उसके आस-पास 5-6 पिशाच और खड़े थे. क्रिस्टन व नेफ्थन का अच्छे से स्वागत किया गया. क्रिस्टन ने अपनी समस्या किमियन को सुनाई कि एस्कॉर्ट को डफलीन से खतरा हैं, इसलिए वो उससे मदद मांगने आया हैं. नेफ्थन गुस्से में दोनों की शक्लें देख रहा था, वो अच्छी तरह जानता था कि क्रिस्टन को अपने राज्य के बजाय खुद की ज़िन्दगी की चिंता ज्यादा सता रही थी क्यूंकि डायनों के निशाने पर एस्कॉर्ट नहीं क्रिस्टन था. किमियन ने क्रिस्टन की मदद करने के लिए एक शर्त रखी जिसे क्रिस्टन ने बेझिझक स्वीकार कर लिया. शर्त यह थी कि आज से एस्कॉर्ट वैम्पर के अधीन रहेगा. नेफ्थन मायूस हो गया, वो चाहकर भी कुछ नहीं कर सकता था.

                      अगली सुबह सभी डायने आसीन के घर के बाहर खड़ी बतिया रही थी. इवान्स व आसीन घर से बाहर आये.

दी एस्कॉर्ट हार्ट -7- (सन मीट्स मदर)

पिछली कड़ी:- दी एस्कॉर्ट हार्ट -6- (विच रिटर्न्स एंड घोस्ट इज बैक)

अगली सुबह जैसे ही उसकी नींद खुली व अचंभित रह गया. उसके सामने एक आकृति मुस्कुराते हुए हवा में तैर रही थी. उसका दोस्त वापस लौट आया था उसके पास....“एस्कॉर्ट का भूत”.
“कैसे हो मेरे दोस्त?”-भुत ने इवांस को देख ख़ुशी प्रकट की.
“भूत!”-इवान्स प्रफुल्लित अपनी जगह से उठा, वो भूत को देखते ही परी, माँ, पिता सबसे जुडी समस्याएं उसके दिलो-दिमाग से छूमंतर हो गई.
“मैंने कहा था ना कि बहुत जल्दी वापस आऊंगा, क्यूंकि मेरे बिना तुम अधूरे हो”
“तुम्हे पता हैं, मेरे साथ क्या हुआ?”-इवान्स फिर से निराशा में डूब चूका था.
“मुझे पता हैं नहीं, मुझे पहले से ही पता था कि यह सब होने वाला हैं”-भूत ने अपना राज खोला.
“तो तुमने मुझे बताया क्यूँ नहीं?”-इवान्स चिल्लाया.
“अगर तुम्हे बता देता, तो भीं तुम कुछ नहीं कर सकते, जो होना हैं वो होकर रहेंगा....”-भूत ने शांत लहज़े से जवाब दिया.
“....और इतने से में तुम हिम्मत हार गए, अभी तो शुरुआत हैं मेरे दोस्त, बहुत कुछ होना बाकी हैं”
“बहुत कुछ क्या?”-इवान्स गुस्से में बोला.
“हर कदम पर तुम्हे अपनों से लड़ना हैं”

“अब और कितने अपनों से लड़ना हैं मुझें?”
“वक़्त आने पर सब पता चल जायेंगा”
“और वो वक़्त कब आयेंगा?”-इवान्स अपना धैर्य खोने लगा था.

दी एस्कॉर्ट हार्ट -6- (विच रिटर्न्स एंड घोस्ट इज बैक)

पिछली कड़ी:- दी एस्कॉर्ट हार्ट -5- (दी सीक्रेट)

“क्या इवान्स आपका बेटा हैं?”

“नहीं, वो तो मुझे जंगल में मिला था, यह बात इवान्स को नहीं पता हैं, लेकिन इसमें राज क्या हैं?”

“इवान्स तुम्हारा ही बेटा हैं, लेकिन रानी एंगेलिका का नहीं”

                      आधी रात होने वाली थी. इवान्स व रोजलीन एक-दुसरे की बाहों में हाथ डाले रात की शान्ति में सो रहे महल में घूम रहे थे. रोजलीन ने अपना सिर इवान्स के कंधे पर रख रखा था. आँखें अधखुली थी. हर रात की भांति इस रात को भी इवान्स को इंतज़ार था उस आवाज का, लेकिन आज कोई आवाज उसके कानों में दस्तक नहीं दे रही थी. काफी वक़्त बीत चूका था दोनों को घूमते-घूमते. आवाज न सुनाई देने की वजह से इवान्स को ख़ुशी होने की बजाय वो बैचैन होने लगा था. उसके कदम अनायास ही रुक गए. उसे एक अजीब बैचैनी महसूस हो रही थी. उसके थोडा आगे सामने खिड़की में हर रात को दिखने वाला उल्लू बैठा था. रोजलीन ने इवान्स के गाल पे एक चुम्बन दिया. लेकिन इससे इवान्स के हाव-भाव में कोई परिवर्तन नहीं आया, वो अभी भी बैचैन दिख रहा था. वो इधर-उधर अपनी नजरें दौड़ा रहा था, मानों कोई चीज़ उसे अपनी तरफ खींच रही हो. फिर रोजलीन ने उसके गर्दन पर एक चुम्बन दिया. फिर उसके गर्दन के होते उसके दिल पर.

                      और अगले ही पल रोजलीन ने अपना मुंह खोला, दो बड़े नुकीले दांत

दी एस्कॉर्ट हार्ट -5- (दी सीक्रेट)

पिछली कड़ी:- दी एस्कॉर्ट हार्ट -4- (डेथ एंड अलाइव)
इवान्स, रोजलीन की याद में काफी अकेला महसूस कर रहा था. उसने शिकार पर  जाना भी छोड़ दिया था. बस पुरे दिन उदास रोजलीन की याद में कमरे में अपने आप को बंद रखने लगा. साथ ही उसे एक बात यह भी परेशान कर रही थी की वो वापस जिंदा कैसे हो गया?.
        एक महिना बीत गया, रोजलीन की यादें धुंधली पड़ने लगी थी. एक दिन इवान्स को आलिना का ख्याल आया की वो जिंदा हैं या मर गयी. कहीं उसने तो उसे जिंदा नहीं किया वापस, क्यूंकि वो जादूगरनी थी. इवान्स निकल पड़ा जंगल में आलिना के घर की तरफ. घोड़े की रफ़्तार जितनी तेज़ हो सकती थी उतनी तेज़ रफ़्तार से. एकाएक उसने लगाम खिंच घोड़े को रोका. नदी किनारे एक लड़की बैठी थी, ठीक उसी जगह जहाँ उसने पहली बार रोजलीन को देखा था. घोड़े से उतरा. अनायास ही उसके होंठो से लफ्ज़ निकले....’रोजलीन”.
        लड़की ने पलट कर देखा वो रोजलीन ही थी. रोजलीन इवान्स को देखते ही उसकी तरफ भागी, लेकिन आज वो रोशनी से जगमगा न रही थी. इवान्स ख़ुशी-ख़ुशी रोजलीन की तरफ भागा. दोनों एक दुसरे से लिपट गये मानो बरसो बाद मिले हो.

मुझे पक्का यकीन था कि तुम जिंदा हो-रोजलीन हर्षित मन से बोली.
तुमने किया क्या मुझे जिंदा?

दी एस्कॉर्ट हार्ट -4- (डेथ एंड अलाइव)


पिछली कड़ी:- दी एस्कॉर्ट हार्ट -3-(गर्ल, वैम्पायर्स एंड घोस्ट अलविदा)

एक तीर इवान्स के दिल को चीरते आर-पार कर गया. कुछ पल इवान्स जहाँ था वहीँ रुक गया. दिल को आर-पार किये तीर पर दर्द भरी करहाती निगाहें डाली. इवान्स जमीन पर गिर पड़ा.             लड़की की निगाहें उसकी आँखों में अटकी ही रह गयी, उसका जगमगाना बंद हो गया, वो इवान्स की तरफ भागी. इवान्स ज़मीन पर तड़प रहा था. उसके पास पहुंचकर लड़की ने अपने कांपते हाथो से इवान्स के गालो को सहलाने लगी. इवान्स को तडपते देख वो रोने लगी. इवान्स अपनी आखिरी साँसे गिन रहा था. उसने अपनी आंख्ने बंद कर दी थी. उसकी धडकने धीरे से ही सही पर उल्टे पाँव लौट रही थी. अगले ही पल लड़की ने अपने आंसू पौंछे और इवान्स के दिल से तीर निकाल दिया. फिर उसके कपड़ो में कुछ ढूंढने लगी, उसे इवान्स की कमीज़ से एक खंजर मिला. बिना कुछ सोचे-समझे उसने खंजर से अपनी छाती पर वार किया, अपनी छाती के दिल वाले हिस्से के काटकर लड़की ने अपना दिल बाहर निकाला. उसे ज़रा-सा भी दर्द नहीं हुआ. ना ही वो विचलित हुईं. उसका दिल उसके हाथ में था फिर भी वो जिंदा थी. फिर अपना एक हाथ कटे छाती के हिस्से पर फेरा और उसकी छाती फिर से पहले जैसी हो गयी, मानो उसने उसे थोड़ी देर पहले काटा ही न हो. अगले पल उसने इवान्स के साथ भी कुछ ऐसा ही किया. खंजर से उसका सीना काट उसका दिल बाहर निकाला और अपना दिल उसके सीने में डाल दिया. उसके सीने पर उसने थोड़ी देर अपना हाथ फेरा, इवान्स का शरीर सामान्य हो गया. धडकनें दुबारा दौड़ने लगी. इवान्स
 ने अपनी आँखें खोल दी. लड़की ख़ुशी में फिर से जगमगाने लगी थी. चारो तरफ रोशनी ही रोशनी. इवान्स आश्र्यचकित निगाहों से उसे देखने लगा फिर उसने अपने सीने पे हाथ फेरा तो चौंकते हुए उठ बैठा.
कौन हो तुम?, मैं तो मरने वाला था, जिंदा कैसे हो गया?

दी एस्कॉर्ट हार्ट -3- (गर्ल, वैम्पायर्स एंड घोस्ट अलविदा)

पिछली कड़ी:- दी एस्कॉर्ट हार्ट -2- (दी मैजिशियन विच आलिना)


           हिरण इवान्स के पास खड़ा उसे घुर रहा था. तभी पास के कच्चे रास्ते पर पुरानी शाही घोड़ागाड़ी आ रही थी, जिसके आगे चार घोड़े बंधे थे और उसे खूबसूरत आलिना चला रही थी. आलिना को आते देख भूत को दुबारा गायब होना पड़ा. ज़मीन पर बेहोश पड़े इवान्स के पास आकर घोड़ागाड़ी रुकी. आलिना नीचे उतरकर पहले इवान्स के सीर पर हाथ फेरा, फिर हिरण की तरफ देखा.

बद्तमीज़, मार तो नहीं डाला मेरे राजकुमार को, चल भाग अब यहाँ से-चेहरे पर जबरदस्ती चिंता के भाव प्रकट करते हुए बोली.

इतना कहते ही हिरण वहाँ से भाग गया. आलिना ने घोड़ों की तरफ देखा और आँखों से जादू कर उन्हें इंसान बना दिया. उन चारो इंसानों ने इवान्स को उठाकर गाडी में रखा फिर से वापस घोड़े बन गये.  घोड़ागाड़ी चल पड़ी आलिना के घर की तरफ.

इवान्स पलंग पर बेहोश लेटा था. आलिना ने इवान्स को एक जादुई दवा पिलाई और उसे होश आ गया. अपने आप को अनजान जगह पर देख उठ बैठा, लेकिन उसका सिर अभी भी चकरा रहा था.

राजकुमार आप चिंता न करे, अब आप एकदम ठीक हैं

दी एस्कॉर्ट हार्ट -2- (दी मैजिशियन विच आलिना)


 
“तुम जाकर राज्य में ऐलान करो की राजा क्रिस्टन एस्कॉर्ट के राजकुमार के साथ आ रहे हैं”- नेफ्थन ने एक सिपाही को आदेश दिया. भूत मुस्कुराते हुए तालियां पीटने लगा. आदेश मिलते ही सिपाही घोड़े पे सवार राज्य की तरफ रवाना हुआ. राजा ने मासूम का माथा चूमा और उसे सीने से लगा दिया.
                     घोड़े पे सवार सिपाही पहाडियों से घिरे एस्कॉर्ट राज्य की तरफ बढ़ रहा था. कच्चे-पक्के मकान, बाजार, गलिया और अंत में क्रिस्टन का आलिशान राजमहल जो ऊँचे पहाड़ से सटा था. राज्य के दाहिनी तरफ घना जंगल था, तो बायीं तरफ खुला हरा-भरा मैदान. पहाड़ियों से घिरे एस्कॉर्ट में प्रवेश करने के तीन दरवाजे थे. एक मुख्य दरवाजा ठीक सिपाही के सामने था, दुसरा दरवाजा दाहिनी तरफ जंगल की ओर था शिकार खेलने करने के लिए तो तीसरा दरवाजा बायीं तरफ मैदान की ओर बहादुरी और कुर्बानी का खेल खेलने के लिए. तीनों दरवाजे सूर्योदय से पहले और सूर्यास्त के बाद बंद रहते थे. चारो तरफ की पहाड़ियाँ एस्कॉर्ट को महफूज़ रखने के लिए काफी थी, लेकिन राजा क्रिस्टन ने पहाड़ियों पर भी सैनिकों की टुकडियो से लैस चौकिया बना रखी थी, जो हर 50 फीट पर मौजूद थी.

                     घोड़े पे सवार सिपाही राज्य के मुख्य दरवाजे से प्रवेश करते जोर से चिल्लाना शुरू किया. “सुनिए, सुनिए, सुनिए....” सब लोग अपने काम से ध्यान से हटा सिपाही की तरफ देखने लगे.

“एस्कॉर्ट राज्य के लिए खुशखबरी की बात हैं, राजा को जंगल में एक 10 महीने का बच्चा मिला हैं, उन्होंने उसे गोद लेने का ऐलान किया हैं, वो बच्चा होगा एस्कॉर्ट का भावी राजकुमार, एस्कॉर्ट का उत्तराधिकारी”
 

सब लोगो के चेहरे पर ख़ुशी व आश्चर्य के मिलेजुले भाव थे. सब एक-दुसरे का मुंह देख रहे थे.

“क्या भविष्यवाणी सच हो गई?”